एक अनार, सौ बीमार : बिलासपुर से उठता मौन का दर्शन

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बैम्बू पोस्ट 9 जनवरी 2026 बिलासपुर।
बिलासपुर इन दिनों संस्कारधानी कम, प्रयोगशाला ज़्यादा लग रहा है—जहाँ साहित्य पर नहीं, साहित्य की सहनशीलता पर प्रयोग चल रहा है। विषय था परिसंवाद, पर जो घटा वह किसी गुप्त प्रशासनिक अनुष्ठान से कम नहीं। मंच पर शब्द बैठे थे, पर उन्हें बोलने से पहले पहचान-पत्र दिखाना था—कि वे विषय के हैं या विचार के।
घटना की सतह पर जो दिखता है, वह सीधा है: एक वरिष्ठ कथाकार, एक कुलपति, एक सवाल और उसके बाद सक्रिय हुई सुरक्षा व्यवस्था। पर साहित्य में सतह पर कौन विश्वास करता है? असली कथा तो भीतर बहती है—वहीं जहाँ एक अनार मंच पर रखा है और सौ बीमार उसके चारों ओर खाँस रहे हैं।
यह अनार कौन है?
संभव है—प्रतिष्ठा।
संभव है—पद।
संभव है—वह कुर्सी, जिस पर बैठते ही व्यक्ति नहीं, संस्था बोलने लगती है।
और बीमार कौन हैं?
लेखक, जो सवाल पूछ बैठते हैं।
श्रोता, जो सुनने की उम्मीद लेकर आते हैं।
विश्वविद्यालय, जो ज्ञान का घर होते हुए भी असहमति से एलर्जी रखता है।
कुलपति महोदय का प्रश्न—“बोर तो नहीं हो रहे हैं?”—दर्शनशास्त्र का नया सूत्र है। यह प्रश्न नहीं, संकेत था। एक ऐसा प्रशासनिक मंत्र, जिसके उच्चारण से तय हो जाता है कि अब साहित्य को अपनी सीमा याद कर लेनी चाहिए। कथाकार ने भूल कर दी—उन्होंने संकेत को संवाद समझ लिया। “विषय पर आइए” कहकर उन्होंने वही किया, जो साहित्य सदियों से करता आया है—सत्ता से सीधी आँख मिलाकर बात।
बस यहीं प्रेम का प्रवेश होता है।
कहते हैं, प्रेम के कारण यह घटना घटी।
प्रेम—लेकिन किससे?
संभव है, प्रेम अनुशासन से हो।
संभव है, प्रेम नियंत्रण से हो।
और यह भी संभव है कि प्रेम मौन से हो—क्योंकि मौन सबसे वफादार होता है, न सवाल पूछता है, न बयान देता है।
देश भर के साहित्यकार लिख रहे हैं, पत्रकार छाप रहे हैं, सड़कें आवाज़ से भर रही हैं। रायपुर में विरोध है, बिलासपुर में देवकीनंदन चौक पर जमावड़ा है, राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन हैं। लेकिन विश्वविद्यालय? वह अपने प्रियतम मौन के साथ खड़ा है—अडिग, अभेद्य, और प्रशासनिक रूप से निर्दोष।
यह मौन कोई साधारण मौन नहीं। यह वह मौन है, जो फाइलों में सुरक्षित रहता है, जो मीडिया सेल को भी चुप करा देता है, और जो सवालों को थका कर घर भेज देता है। यदि कुलपति सही थे, तो मौन क्यों? और यदि मौन सही है, तो फिर विश्वविद्यालय में बोलने का अभ्यास क्यों?
असल रहस्य यहीं है।
यह घटना किसी एक लेखक का अपमान नहीं, बल्कि साहित्य की औकात निर्धारण बैठक थी। संदेश साफ़ है—आइए, बोलिए, लेकिन उतना ही जितना एजेंडा अनुमति दे। सोचिए, पर धीरे। सवाल पूछिए, पर मन में।
तो सवाल यह नहीं कि
“क्या अब कोई साहित्यकार संस्कारधानी बिलासपुर आएगा?”
सवाल यह है कि
क्या वह लेखक आएगा, जो सवाल पूछने की आदत छोड़ चुका हो?
क्योंकि इस नए युग में मंच सबको मिलेगा—
बस शर्त इतनी है किट
साहित्य अनार बने,
और बीमार होना छोड़ दे।

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