बैम्बू पोस्ट 24 जनवरी 2026/बिलासपुर/ रायपुर।
छत्तीसगढ़ में इन दिनों साहित्य पढ़ा नहीं जा रहा, नियंत्रित किया जा रहा है। रचना अब सृजन नहीं, शेड्यूलिंग इवेंट है और विचार अब स्वतंत्र नहीं, पूर्व-अनुमोदित गतिविधि बन चुका है। प्रदेश के साहित्यिक परिदृश्य में “बुकिंग फुल” का बोर्ड टंग चुका है—तिथियों पर, मंचों पर और अब तो शायद शब्दों पर भी।
8 फरवरी 2026 को लेकर बिलासपुर में जो घटेगा, उसने साहित्य को एक नई प्रशासनिक पहचान दे दी है। कृति कला एवं साहित्य परिषद का विनम्र-सा पत्र दरअसल यह घोषित करता है कि—
“उस दिन साहित्य केवल एक जगह होगा, बाकी जगह मौन रहेगा।”
यानी कविता लिखना तो दूर, अगर किसी को अचानक कोई शेर सूझ जाए, तो उसे भी कैलेंडर देखकर ही सूझना चाहिए।
विशेषज्ञ इसे छत्तीसगढ़ का पहला “साहित्यिक लॉकडाउन” मान रहे हैं, जहाँ आयोजन के लिए नहीं, न करने के लिए अपील जारी की गई है। साहित्य अब बहती नदी नहीं, आरक्षित जलाशय है—जहाँ एक समय में एक ही नल खोला जाएगा।
रायपुर साहित्य उत्सव 2026: पंजीकरण है, सहभागिता नहीं
उधर नवा रायपुर में आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव 2026 ने इस आपातकाल को औपचारिक जामा पहना दिया है। प्रदेश की 27 जिलों में पंजीकृत साहित्यिक संस्थाओं को न तो सूचना दी गई, न राय ली गई।
सरकार की भूमिका स्पष्ट है—
“आप लिखते रहिए, आयोजन हम करवाएँगे।”
यह उत्सव अब साहित्य का नहीं, प्रबंधन का महोत्सव बन चुका है। प्रवेश के लिए QR कोड है, रिस्ट बैंड है, सुरक्षा प्रोटोकॉल है—बस जो नहीं है, वह है साहित्यिक सहमति।
परिसंवाद या अनुशासन शिविर?
साहित्य अकादमी और केंद्रीय विश्वविद्यालय के साझा आयोजन ने तो स्थिति को और स्पष्ट कर दिया। नाम था—परिसंवाद, पर स्वरूप था—दरबार।
कुलपति महोदय का ऐतिहासिक प्रश्न—
“बोर तो नहीं हो रहे हैं?”
असल में साहित्य के लिए चेतावनी थी।
जैसे ही एक कथाकार ने साहस करके कहा—“विषय पर आइए”,
साहित्य अनधिकृत गतिविधि घोषित कर दिया गया।
न बहस, न प्रतिवाद—सीधे सुरक्षा व्यवस्था।
यह वही दौर है जहाँ लेखक को बोलने से पहले यह सोचना पड़ता है कि—
कुर्सी ज़्यादा पुरानी है या विचार ज़्यादा नया।
साहित्य का नया संविधान
छत्तीसगढ़ में साहित्य अब इन नए नियमों से संचालित हो रहा है:
एक दिन, एक मंच, एक विचार
असहमति = व्यवधान
प्रश्न पूछना = अनुशासनहीनता
मौन = प्रशासनिक सद्गुण
आयोजन से बेहतर है—उपस्थिति
जन संस्कृति मंच के विरोध, साहित्यकारों के बयानों और ज्ञापनों के बीच विश्वविद्यालय अपने प्रियतम मौन के साथ खड़ा है—अडिग, सुरक्षित और जवाबदेही-मुक्त।
छत्तीसगढ़ में यह साहित्य का संकट नहीं, साहित्य की परीक्षा है।
यह तय किया जा रहा है कि—
कौन लिखेगा,
कब लिखेगा,
कहाँ लिखेगा,
और सबसे ज़रूरी—
कितना लिखेगा।
यह आपातकाल किसी घोषणा से नहीं आया,
यह विनम्र निवेदनों, शालीन पत्रों और संस्थागत मौन से लागू हुआ है।
और शायद यही कि यहाँ साहित्य अब भी जीवित है,
बस तारीख़ देखकर साँस ले रहा है।
