अचानकमार में बाघ नहीं मरा, व्यवस्था सड़ चुकी है

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बैम्बू पोस्ट 26 जनवरी 2026 बिलासपुर।
अचानकमार टाइगर रिज़र्व (ATR) में बाघ की मौत कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी का खुला पोस्टमार्टम है।
सरसडोल क्षेत्र के कुडेला पानी में मिला बाघ का शव जंगल की नहीं, बल्कि प्रबंधन की लापरवाही और संवेदनहीनता की बदबू फैला रहा है। बताया जा रहा है कि शव करीब 6 दिन पुराना है—यानी बाघ मरा, सड़ता रहा और सिस्टम या तो सोता रहा… या जानबूझकर आंख मूंदे बैठा रहा।
सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि इन्हीं दिनों अचानकमार में बाघों की गणना चल रही है।
एक तरफ काग़ज़ों में बाघ गिने जा रहे हैं, दूसरी तरफ हकीकत में बाघ मरकर जंगल में पड़ा रहा—और किसी “जिम्मेदार” अधिकारी की नज़र उस तक नहीं पहुँची।
क्या गणना केवल फाइलों के लिए होती है, या जंगल के लिए भी?
संदिग्ध परिस्थितियों में मिले इस शव ने फील्ड डायरेक्टर और डिप्टी डायरेक्टर के हाथ-पांव फुला दिए, लेकिन असली सवाल बाघ की मौत का कारण नहीं है—
सवाल यह है कि 48 घंटे तक इस खबर को दबाकर क्यों रखा गया?
जवाब सीधा है—क्योंकि उसी समय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय शनिवार-रविवार बिलासपुर में मौजूद थे।
शायद प्रबंधन को लगा कि बाघ की मौत से बड़ा संकट खबर का बाहर आ जाना है।
विडंबना देखिए—फील्ड डायरेक्टर शिवतराई में ही रहते हैं, अचानकमार गाँव से महज़ 15 किलोमीटर दूर बाघ का शव पड़ा रहता है, और किसी को भनक तक नहीं लगती।
या फिर लगती है, लेकिन फाइलों, फोन कॉल्स और राजनीतिक समीकरणों के नीचे दबा दी जाती है।
यह कोई पहली चूक नहीं है।
पिछले साल इसी महीने ATR में एक बाघिन की मौत हुई थी। तब भी वही पुरानी कहानी—जांच के आदेश, बयानबाज़ी, और फिर जंगल जैसा घना सन्नाटा।
न दोषी तय हुआ, न जिम्मेदारी फिक्स हुई।
अब सवाल और भी ज़्यादा खतरनाक हो जाता है—
क्या अचानकमार टाइगर रिज़र्व अब बाघों का सुरक्षित घर नहीं, बल्कि अधिकारियों की आरामगाह बन चुका है?
क्या राजनीतिक संरक्षण इतना मजबूत है कि उसके नीचे वन्यजीव संरक्षण, जवाबदेही और नैतिकता तीनों कुचले जा रहे हैं?
अचानकमार में आज एक बाघ नहीं मरा है।
आज निगरानी मरी है, जवाबदेही मरी है और सिस्टम की आत्मा दम तोड़ चुकी है।
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में ATR में दहाड़ सुनाई नहीं देगी—
सिर्फ़ चुप्पी होगी… और सड़ांध।

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