
बैम्बू पोस्ट 10 जनवरी 2026 बिलासपुर।
पोला रेस मैदान उस वक्त अचरज में पड़ गया, जब रेस से ज़्यादा दर्शक दीर्घा की तालियों ने माहौल गरमा दिया। बताया जाता है कि एक साड़ पोला रेस में भाग लेने के बजाय दर्शक दीर्घा में बैठकर “बौद्धिक समर्थन” दे रहा था। तालियों की गूंज से ऐसा लग रहा था मानो रेस नहीं, किसी साहित्य गोष्ठी का समापन सत्र चल रहा हो।
कई दिनों बाद अचानक एक और गाय दर्शक दीर्घा में प्रकट हुई और उसने भी तालियां बजानी शुरू कर दीं। यह दृश्य पहले से मौजूद गाय को नागवार गुज़रा। सूत्रों के अनुसार, “तालियों पर एकाधिकार” टूटते देख पहली गाय ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की।
प्रतिक्रिया स्वरूप, पहली गाय ने एक साहित्यिक साड़ को पोला रेस में उतार दिया। मैदान में रेस कम और तालियां ज़्यादा बजने लगीं। साड़ के हर कदम पर ऐसी तालियां पड़ीं मानो वह दौड़ नहीं रहा, विचारधारा प्रस्तुत कर रहा हो।

लेकिन यह सब ताकतवर कुल पति टाइप साड़ को रास नहीं आया। अनुशासन, परंपरा और ताकत के सिद्धांतों पर खड़े इस साड़ ने साहित्यिक साड़ की “बौद्धिक दौड़” को असहनीय बताया और बिना किसी विमर्श के उसे मैदान से खदेड़ दिया।
इस घटना के बाद मैदान में नया मोर्चा खुल गया। साड़ टाइप साड़ मैदान में धरना-प्रदर्शन पर बैठ गए। नारे लगे—
“रेस में भी अभिव्यक्ति की आज़ादी!”
“तालियों पर नहीं, ताकत पर सवाल क्यों?”
इसी बीच, पूरा घटनाक्रम शुरू करने वाली दोनों गायें मौके-ए-वारदात से रहस्यमय ढंग से गायब हो गईं। न तालियां रहीं, न तालियां बजाने वाले।
प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है, जबकि दर्शकों का मानना है कि पोला रेस अब रेस नहीं रही—यह वैचारिक संघर्ष का मैदान बन चुकी है।
साड़ पोला रेस बना साहित्यिक अखाड़ा: तालियों से तकरार तक का सफ़र
