
बैम्बू पोस्ट 21 जनवरी 2026 बिलासपुर।
एनटीपीसी सीपत के आसपास बसे गाँव—सीपत, जांजी, देवरी, कौड़िया, रांक, रलिया, गतौरा और कर्रा—इन दिनों हवा में घुली “विकास की राख” का स्वाद चख रहे हैं। 15 शासकीय प्राथमिक शालाओं में पढ़ने वाले कक्षा 1 से 5 तक के कुल 1492 बच्चे, और गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ—सबके फेफड़ों में एक समान ‘प्रगति’ समा रही है। आँखें जलती हैं, साँसें भारी हैं, पर तस्वीरें चमकदार हैं।
राख की इस चादर के बीच एनटीपीसी सीपत प्रबंधन की छत्रछाया में पनप रही संगवारी महिला समिति ने राहत का वह ऐतिहासिक कदम उठाया, जिसे कैमरे ने तुरंत पहचान लिया—स्वेटर वितरण। 15 स्कूलों के 1492 विद्यार्थियों को स्वेटर पहनाए गए, मुस्कानें सजीं, कतारें बनीं और क्लिक-क्लिक के बीच मानो संदेश साफ़ था: हवा में राख हो तो क्या, तस्वीर में ऊन है!
स्थानीय बुजुर्ग महिलाएँ, जो रोज़ सुबह राख झाड़ते-झाड़ते दिन शुरू करती हैं, पूछती दिखीं—“बिटिया, हमारे लिए कौन-सा स्वेटर है? या हमें सिर्फ़ पृष्ठभूमि बनना था?” जवाब में कैमरा मुस्कुराया, और कार्यक्रम आगे बढ़ गया।
यहाँ व्यंग्य यह नहीं कि स्वेटर बुरा है—व्यंग्य यह है कि राख का इलाज ऊन से किया जा रहा है। बच्चों के गले में खाँसी की खराश है, पर फोटो में कॉलर खड़ा है। साँसों में धूल है, पर फ्रेम में गरिमा है। समस्या हवा की है, समाधान एल्बम का।
प्रशासनिक बयान अपेक्षित है—“हम जनहित के प्रति संवेदनशील हैं।” संवेदनशीलता का पैमाना भी तय है: फ्रेम में फिट हो तो जनहित, हवा में घुल जाए तो प्रकृति का मामला। राख उड़ती रहे, पर कार्यक्रम उड़ना नहीं चाहिए।
कुल मिलाकर, सीपत की हवा आज यह सीख दे रही है कि
स्वास्थ्य अगर अदृश्य हो, तो दृश्य राहत काफी है।
और जब तक कैमरा चलता है, तब तक राख भी रुककर मुस्कुराती है।
राख में लिपटी राहत की तस्वीर
