बैम्बू पोस्ट 4 दिसंबर2025 बिलासपुर।
जिला वन्य प्राणी बोर्ड के लिखित आदेश से शिवतराई–केंवची मार्ग वर्षों पहले वन्यजीव सुरक्षा के नाम पर बंद किया गया था। तर्क था—अचानकमार टाइगर रिज़र्व घोषित क्षेत्र में मानव आवागमन से बाघों को खतरा है।
विडंबना यह कि जिस जंगल में न तब बाघ थे, न आज हैं—वहीं सैकड़ों ग्रामीण परिवार उजाड़ दिए गए, रास्ते बंद कर दिए गए और विकास “वन-विलास” तक सिमट गया।
अब हालात ये हैं कि कुछ रसूखदार रिसॉर्ट संचालकों की सुविधा के लिए वही “सुरक्षा कारणों” से बंद रास्ता दोबारा खोलने की कवायद तेज हो गई है। सवाल यह है कि –
अगर बाघ नहीं हैं तो गांव क्यों उजड़े?
और अगर आज बाघ हैं तो रिसॉर्ट कैसे खुल रहे हैं?
इतिहास के पन्नों में फर्जी दहाड़
अचानकमार को टाइगर रिज़र्व घोषित करते वक्त वन्यजीव संरक्षण की आड़ में
✔️ सैकड़ों परिवार विस्थापित कर दिए गए
✔️ जनसुविधा के मार्ग बंद कर दिए गए
✔️ करोड़ों रुपये की योजनाएं मंजूर हो गईं
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि टाइगर उपस्थिति के वैज्ञानिक प्रमाण हमेशा संदिग्ध रहे। कैमरा ट्रैप रिपोर्ट, ट्रैक सर्वे—सब कागजों में सीमित रहे, जमीन पर बाघ नदारद।
“संरक्षण” का नया संस्करण – रिसॉर्ट मॉडल
अब वही जंगल जहां ग्रामीणों की पगडंडियां खतरा थीं, वहां
टूरिस्ट जीपें दौड़ेंगी
रिसॉर्ट चमकेंगे
वीआईपी सैर-सपाटा होगा
यानी आम जनता प्रतिबंधित,
और “टूरिज्म विकास” निर्भीक।
जनता पूछ रही है:
अगर बाघ नहीं थे तो टाइगर रिज़र्व क्यों?
विस्थापन किस योजना के तहत हुआ?
मार्ग बंद करने का औचित्य क्या था?
अब मार्ग खोलने की अनुमति किस नियम से?
जांच की मांग
जनता और सामाजिक संगठनों की मांग है कि—
> अचानकमार टाइगर रिज़र्व की स्थापना से लेकर आज तक के खर्च, विस्थापन और सड़क बंदी के निर्णयों की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हो।
ताकि ये साफ हो सके कि
संरक्षण की आड़ में करोड़ों की उगाही का खेल चला या सचमुच बाघों की रक्षा?
अंतिम दहाड़
अचानकमार में असली बाघ नहीं मिले,
मगर “फर्जी दहाड़” जरूर गूंजती रही—फाइलों में भी, फंड में भी।
अब जनता पूछ रही है—
> जंगल किसका है?
कानून किसके लिए है?
और “टाइगर रिज़र्व” असली है या सिर्फ़ सरकारी छलावा?
