अचानकमार टाइगर रिज़र्व: बाघ खोजो अभियान और गाँव हटाओ योजना

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बैम्बू पोस्ट 13 जनवरी 2026 बिलासपुर।
अचानकमार टाइगर रिज़र्व इन दिनों एक अजीब दुविधा में है। यहाँ बाघ हैं—या नहीं हैं—इस सवाल का जवाब अफसरों और ग्रामीणों के पास अलग-अलग है। फर्क बस इतना है कि बाघ न दिखने का नुकसान सिर्फ ग्रामीणों को उठाना पड़ रहा है, और बाघ होने का फायदा सिर्फ काग़ज़ों को मिल रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड कहता है—“अचानकमार में पाँच बाघ हैं।”
ग्रामीण कहते हैं—“हमने तो आज तक एक भी नहीं देखा।”
अफसर जवाब देते हैं—“दिखेंगे, अगली गणना में दिखेंगे, 2026 में ज़रूर दिखेंगे।”
यानी बाघ फिलहाल श्रद्धा का विषय हैं—दिखते नहीं, पर माने जाते हैं।
कोर एरिया में बसे गाँवों को हटाने की कवायद ज़ोरों पर है। तर्क साफ़ है—बाघों की शांति और सुरक्षा। लेकिन सवाल यह है कि जिन बाघों को बचाने के लिए इंसानों को हटाया जा रहा है, वे बाघ आख़िर हैं कहाँ? अगर जंगल में बाघ नहीं हैं, तो फिर यह रिज़र्व किस प्रजाति के लिए सुरक्षित है—फाइलों के लिए या फंड के लिए?
ग्रामीणों का आरोप है कि जबरन टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया। उसके बाद क्या बदला?
लकड़ी कटाई पहले से ज़्यादा,
शिकार बेरोकटोक,
अवैध गतिविधियाँ खुलेआम,
और आसपास से सैकड़ों गायों की तस्करी—सब कुछ जारी है।
बस फर्क इतना है कि अब इन सबके बीच रहने वाला ग्रामीण अवैध हो गया है।
2009 में छह गाँव हटाए गए थे। तब कहा गया था—“सभी 22 गाँव हटेंगे।”
आज भी वही कहानी, वही वादा, वही डर।
बाघ नज़र नहीं आते, लेकिन विस्थापन का नोटिस हर बार साफ़ दिखाई देता है।
ग्रामीण पूछते हैं—
“अगर अचानकमार में बाघ हैं ही नहीं, तो कब तक दूसरे रिज़र्व के बाघों को अपना बताकर हमारा घर उजाड़ते रहेंगे?”
“क्या बाघ संरक्षण का मतलब सिर्फ़ यह है कि जंगल में इंसान न रहे, चाहे जंगल में बाघ हों या न हों?”
सरकार कहती है—“2026 में फिर गणना होगी।”
ग्रामीण कहते हैं—“तब तक हम कहाँ होंगे?”
यह रिपोर्ट किसी बाघ के ख़िलाफ़ नहीं है।
यह रिपोर्ट उस सिस्टम पर तंज है,
जहाँ बाघ अदृश्य हैं,
पर विस्थापन पूरी तरह दृश्य,
जहाँ जंगल में सबसे असुरक्षित प्रजाति—
वहाँ का मूल निवासी इंसान है।
शायद अब समय आ गया है कि या तो
जंगल में बाघ सच में दिखाए जाएँ,
या फिर
टाइगर विहीन टाइगर रिज़र्व की ईमानदार स्वीकारोक्ति हो—
ताकि जंगल के गाँव अपने कला, संस्कृति, आस्था और विश्वास के साथ
ज़िंदा रह सकें,
काग़ज़ों के बाघों के नीचे दबकर नहीं।

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