
बैम्बू पोस्ट 28 जनवरी 2026 बिलासपुर।
शहर के एक सभागार में आज राजनीति ने भाषण नहीं दिया—
उसने ताल बाँधी।
फ़र्श पर दरी थी, बीच में मादर, चारों ओर गंभीर चेहरे, माथों पर तिलक और हाथों में ताल। दृश्य धार्मिक था, लेकिन ध्वनि पूरी तरह राजनीतिक। बताया गया कि यह “सांस्कृतिक आयोजन” है, पर हर थाप के साथ नीतियों की गूँज साफ़ सुनाई दे रही थी।
पाण्डेय जी मादर बाजावत आवे।
बजावत ऐसे, जैसे बरसों से जानते हों—
कहाँ ज़ोर देना है और कहाँ हल्का छोड़ देना है।
धीमी थाप—“स्थिति नियंत्रण में है।”
तेज़ थाप—“चुनावी मौसम आ चुका है।”
सभा में बैठे लोग दो वर्गों में स्पष्ट दिखे—
एक, जो सुर समझते हैं।
दूसरे, जो सिर्फ़ ताल पहचानते हैं।
कुछ लोग किताब खोलकर बैठे थे—शायद संविधान, शायद पिछला घोषणापत्र। वे हर थाप के बाद पन्ना पलटते रहे, मानो यह जाँच रहे हों कि आवाज़ लिखित आश्वासन से मेल खा रही है या नहीं।
राजनीति यहाँ तर्क से नहीं, लय से चल रही थी।
जहाँ सवाल उठने की आशंका होती,
वहाँ तालियाँ पहले बजा दी जातीं।
जहाँ असहमति सिर उठाती,
वहाँ भजन का मुखड़ा बदल दिया जाता।
दार्शनिक रूप से देखें तो यह दृश्य लोकतंत्र का संक्षिप्त पाठ था—
जब भीड़ एक सुर में हो,
तो सच का सुर अलग सुनाई देता है।
और अलग सुर को अक्सर
“बेसुरा” घोषित कर दिया जाता है।
कार्यक्रम के अंत में मादर शांत हुई।
तालियाँ बजीं।
चेहरों पर संतोष था—
क्योंकि आवाज़ आई थी,
शोर बना था,
और माहौल सफल रहा।
लेकिन रिपोर्टिंग का सवाल अब भी वहीं है—
क्या यह आवाज़ जनता की थी,
या सिर्फ़ चमड़ी को कसकर बजाने की कला?
लोकतंत्र की दरी पर सत्ता का अभ्यास सत्र।
पाण्डेय जी मादर बाजावत आवे, लोकतंत्र ताल मिलावत आवे
