धरना, ढोल-नगाड़े और दाल-भात

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बैम्बू पोस्ट 29 दिसंबर 2025,बिलासपुर।
गरीबों की पीड़ा पर पकती राजनीतिक रोटियाँ**
(विशेष रिपोर्ट)
कभी लोकतांत्रिक प्रतिरोध की गंभीर पहचान रहा धरना-प्रदर्शन अब धीरे-धीरे उत्सव, तमाशा और चुनावी मंच में तब्दील होता जा रहा है। हालिया धरना-स्थल पर नज़र आए दृश्य इस बदलते स्वरूप की बानगी मात्र हैं, जहाँ एक ओर मंच पर गीत-संगीत, नृत्य और नारों की गूंज है, तो दूसरी ओर ज़मीन पर बैठी महिलाएँ, बुज़ुर्ग और बच्चे अपनी असल ज़रूरतों के जवाब का इंतज़ार करते दिखाई दिए।
मंच पर रंग-बिरंगे गुब्बारे, बड़े-बड़े पोस्टर और नेताओं की मुस्कुराती तस्वीरें यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहीं कि यह आयोजन संवेदना से अधिक संदेश और प्रदर्शन का माध्यम बन चुका है। सवाल यह नहीं कि मंच सजा या गीत गाए गए, सवाल यह है कि क्या इन सबके बीच गरीब की आवाज़ सचमुच सुनी गई?

धरने में बड़ी संख्या में महिलाएँ और बुज़ुर्ग मौजूद रहे। उनके चेहरों पर उम्मीद कम और थकान अधिक झलक रही थी। कोई रोज़ी-रोटी की चिंता में डूबा था, तो कोई उजड़ते आशियाने के डर से सहमा हुआ। मगर मंच से उठती आवाज़ों में समस्याओं से ज़्यादा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की गूंज सुनाई दी।
धरना-स्थल पर भोजन वितरण का दृश्य भी कम प्रतीकात्मक नहीं था। पत्तलों में परोसा गया भोजन जहां एक ओर ‘जनसेवा’ का संदेश देता दिखा, वहीं यह दृश्य यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भूख को एक दिन की दावत से शांत किया जा सकता है?
गरीबी की आग पर सहानुभूति की एक करछी डालकर क्या जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा जा सकता है?
राजनीतिक दलों और संगठनों के लिए धरना अब केवल संघर्ष का माध्यम नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं को भुनाने का अवसर बनता जा रहा है। मंच से उठती भावुक अपीलें, कैमरों की मौजूदगी और भीड़ की तस्वीरें आने वाले समय में किसके काम आएंगी, यह समझना कठिन नहीं।

सवाल जनता का है—
धरने बदले या नहीं, लेकिन क्या नीयत बदली?
गरीबों की पीड़ा मुद्दा बनी या सिर्फ पृष्ठभूमि?
लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन जब विरोध प्रदर्शन बन जाए और पीड़ा प्रचार, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि कहीं धरनों की आग में गरीबों की उम्मीदें ही तो नहीं झुलस रहीं।

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