
बैम्बू पोस्ट 2 जनवरी 2025, एनटीपीसी,सीपत बिलासपुर।
एनटीपीसी सीपत एक बार फिर चर्चा में है। वजह वही पुरानी, अंदाज़ वही आज़माया हुआ—उद्घाटन, भूमिपूजन और विकास की चमचमाती घोषणाएँ। कर्रा गांव में आयोजित कार्यक्रम में करोड़ों रुपये के सीएसआर कार्यों ने मंच पर ऐसा रंग जमाया कि लगने लगा, अब गांवों की तक़दीर तुरंत बदलने वाली है।
मंच से कहा गया कि एनटीपीसी सीपत परियोजना प्रभावित गांवों की तस्वीर बदल रही है। तालाबों का कायाकल्प हो रहा है, शिक्षा को नई दिशा मिल रही है और आधारभूत संरचना मज़बूत हो रही है। भाषणों में विकास इतना तेज़ था कि अगर शब्दों से सड़कें बनतीं, तो कर्रा से दिल्ली तक एक्सप्रेस-वे तैयार हो जाता।
लेकिन मंच से थोड़ी दूरी पर खड़े एनटीपीसी सीपत से सटे गांव के एक बुज़ुर्ग ग्रामीण ने धीमे स्वर में मुस्कुराते हुए कहा—
“साहब, हम तो एनटीपीसी सीपत के साथ ही बूढ़े हो गए। पिछले दस–बारह साल से यही देख रहे हैं। हर साल उद्घाटन होता है, बड़ी बातें होती हैं। अख़बार में फोटो छपती है, लेकिन गांव में हालात वही रहते हैं।”
ग्रामीण आगे कहता है—
“अब नए साहब आए हैं एनटीपीसी सीपत में। वो कहेंगे—‘अभी आया हूं, सब समझ रहा हूं।’ हम भी समझ जाते हैं। फिर एक दिन अख़बार में खबर छपती है—‘एनटीपीसी सीपत के परियोजना प्रमुख का तबादला।’ और कहानी फिर से वहीं से शुरू।”
एनटीपीसी सीपत के सीएसआर बोर्ड गांव में जरूर लगे हैं। बोर्ड पर योजनाएँ चमकती हैं, मगर कई जगह काम इतना धीमा है कि लगता है विकास ‘लोड मैनेजमेंट’ पर चल रहा है—कभी है, कभी नहीं।
हालांकि हर उद्घाटन के साथ उम्मीद भी दोबारा जागती है। ग्रामीण सोचते हैं—शायद इस बार एनटीपीसी सीपत सिर्फ बिजली ही नहीं, ज़मीन पर विकास भी पूरी क्षमता से देगा। शायद इस बार शिलापट्ट से आगे भी कुछ होगा।
कार्यक्रम समाप्त हो गया, मंच खाली हो गया, माइक बंद हो गए। गांव में फिर वही रोज़मर्रा की ज़िंदगी लौट आई। बस फर्क इतना है कि अब एक नया शिलापट्ट और जुड़ गया है—
जिस पर लिखा है “एनटीपीसी सीपत के सौजन्य से”।
गांव वाला हल्की मुस्कान के साथ कहता है—
“चलो, अगली बार फिर एनटीपीसी सीपत के उद्घाटन में मिलेंगे… शायद तब कुछ बदल जाए।”
