बैम्बू पोस्ट 5 दिसंबर 2025 बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में पढ़ाई कम, पढ़वाने का धंधा ज़्यादा फल-फूल रहा है। प्राथमिक और मिडिल स्कूल शिक्षकों की पहली नियुक्ति हो या फिर बाद का स्थानांतरण—सब कुछ अब “युक्तियुक्तकरण” की धार्मिक विधि से संपन्न होता है। फर्क बस इतना है कि यहाँ हवन कुंड में आहुति घी की नहीं, दक्षिणा के नोटों की दी जाती है।
बीते 9 वर्षों से यह फॉर्मूला बिना किसी पाठ्यक्रम परिवर्तन के लगातार पढ़ाया जा रहा है। सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, अधिकारी सेवानिवृत्त हुए—पर बीमारी ज्यों की त्यों बनी हुई है। हर सत्र में शिक्षकों को नई पोस्टिंग की नहीं, नई वसूली सूची की तैयारी करनी पड़ती है। विभागीय गलियारों में खुलेआम चर्चा है कि नियुक्ति से लेकर मनपसंद स्कूल तक पहुँचने का “रेट कार्ड” तय है, और पूरा नेटवर्क इस खेल में पूरी पेशेवर दक्षता से लगा है।
सूत्रों की मानें तो केवल स्थानांतरण प्रक्रिया के नाम पर अब तक लगभग 1000 करोड़ रुपये की दक्षिणा शिक्षकों की जेब से वसूली जा चुकी है। शिक्षा का मंदिर अब करेंसी काउंटर में बदल गया है, जहाँ योग्यता से ज़्यादा “योगदान” का महत्व है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकारें सचमुच पारदर्शिता चाहती हैं, तो यह 9 साल पुराना ‘ओपन सीक्रेट’ अब तक बंद क्यों नहीं हुआ? क्या भ्रष्टाचार का युक्तियुक्तकरण भी कोई सरकारी योजना है?
छत्तीसगढ़ में शिक्षा आज बच्चों को नहीं, बल्कि सिस्टम को पढ़ा रही है—
कैसे हर तबादला बने एक नया कारोबार, और हर नियुक्ति एक नई कमाई का अवसर।
जब तक दक्षिणा चलेगी, शिक्षा लड़खड़ाती रहेगी,
और मंत्री बदलते रहेंगे…
बिमारी बनी रहेगी।
