कोपरा में “रामसर” उतरेगा या “राखसर”?

Spread the love

फोटो: शिरीष डामरे
बैम्बू पोस्ट 3 दिसंबर 2025 बिलासपुर।
जहाँ परिंदे मेहमान बनने आते हैं, वहाँ चिमनियाँ बसाने की तैयारी
छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह दिखाने में व्यस्त है कि वह पर्यावरण संरक्षण को लेकर कितनी गंभीर है। इसका प्रमाण बताया जा रहा है—बिलासपुर का ऐतिहासिक कोपरा जलाशय, जिसे रामसर स्थल घोषित कराने के लिए राज्य सरकार ने प्रस्ताव भेजा है।
पर ज़मीनी सच्चाई यह है कि उसी जलाशय के फेफड़ों में महज़ 6 किलोमीटर की दूरी पर आई.एम.ए.ई.सी. स्टील एंड पावर लिमिटेड का विशाल प्रदूषणकारी उद्योग लगाने की पूरी तैयारी चल रही है।
सरकारी नीति कहती है – “बचाओ तालाब।”
सरकारी फाइलें कहती हैं – “जला दो जंगल।”
यह पर्यावरण संरक्षण की नहीं, पर्यावरण पर उपहास करने वाली नीति बनती जा रही है।
कानून 10 किलोमीटर कहता है – सरकार 6 किलोमीटर में मान जाती है!
सन 2006 की उद्योग नीति स्पष्ट रूप से कहती है—
> किसी भी बड़े प्रदूषणकारी उद्योग को
10 किलोमीटर के भीतर किसी जलाशय या संवेदनशील क्षेत्र से दूर रखा जाएगा।
लेकिन कोपरा जलाशय के मामले में सरकार को अचानक यह नीति याददाश्त से उतर गई।
स्टील प्लांट की दूरी — सिर्फ़ 6 किलोमीटर!
यानि कानून की किताब बंद करके,
परिंदों के घोंसलों पर उद्योग के प्लांट की नींव रखी जा रही है।

रामसर का तमगा या सरकारी तमाशा?
————————————————
कोपरा जलाशय लगभग 150 वर्ष पुराना है। यह सिर्फ़ पानी का भंडार नहीं बल्कि—
हजारों प्रवासी पक्षियों का विश्राम स्थल
दर्जनों जलीय प्रजातियों की शरणगाह
आसपास के किसानों की सिंचाई का जीवन स्त्रोत
हर साल ठंड में दूर-दूर देशों से पंछी आते हैं। सरकार कहती है –
“हम इन्हें अंतरराष्ट्रीय संरक्षण देंगे।”
उसी सांस में फाइल आगे बढ़ती है—
“उसी इलाके में स्टील और पावर प्लांट को मंजूरी दो!”
सरकार शायद यह भूल गई—
पक्षी स्टील की छतों पर नहीं,
नीले आसमान और साफ़ पानी पर उतरते हैं।

जनसुनवाई — कानून या केवल खानापूर्ति?
———————————————————-
19 नवम्बर 2025 को ग्राम सकर्रा में कराई गई जनसुनवाई को स्थानीय लोग “जनता की सुनवाई नहीं, उद्योग की सुनावाई” कह रहे हैं।

कारण:
❌ ग्राम सभा की अनुमति नहीं
❌ 18 पंचायतों को ई.आई.ए. रिपोर्ट नहीं दी गई
❌ भूमि लीज़ के दस्तावेज़ गायब
❌ जल संसाधन विभाग की अनुमति प्रस्तुत नहीं
❌ किसानों को मुआवज़ा शून्य

और तो और—
> जिन पानी की नदियों से उद्योग पानी लेने का दावा कर रहा है –
उन्हीं नदियों में गर्मी में
80% तक पानी सूख जाता है।
मतलब साफ—
पानी पहले किसान पीएँ या फर्नेस?
सरकार का जवाब है – फर्नेस।
CSR: काग़ज़ पर कल्याण, ज़मीन पर कोयले की धूल
पड़ोसी ग्राम बेलमुंडी में पहले से संचालित उद्योग का उदाहरण सामने है—
सड़कें टूटी
मिट्टी कोयले की राख से ढकी
दमे, टीबी, खाँसी से ग्रसित ग्रामीण
CSR और CER योजनाओं के नाम पर—
न वृक्षारोपण
न स्वास्थ्य शिविर
न तालाब
न शिक्षा सहायता
काग़ज़ पर मानव कल्याण,
ज़मीन पर मानव पीड़ा।

प्रवासी पक्षियों की “अदालती चीत्कार”
————————————————–
वन्यजीव विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं—
> “एक बार उद्योग शुरू हुआ
तो पक्षी दोबारा लौटेंगे नहीं।”
धुएँ, शोर और प्रदूषण से—
जलचर मरेंगे
प्रवासी पक्षी अन्य देशों की ओर रुख करेंगे
कोपरा जलाशय केवल गंदे पानी का गड्ढा बनकर रह जाएगा
रामसर से पहले ही “राखसर” बनने की पटकथा लिखी जा रही है।

बैम्बू पोस्ट का सरकार से तीन सीधे सवाल-

(1)❓ अगर कोपरा को रामसर बनाना है
तो उद्योग रोक क्यों नहीं?

(2)❓ अगर उद्योग लगाना है
तो रामसर प्रस्ताव दिखावा क्यों?

(3)❓ किसका हित ज़्यादा ज़रूरी—
परिंदों-किसानों का
या कॉर्पोरेट चिमनियों का?

कोपरा बोलेगा — या धुआँ बोलेगा?

यह लड़ाई केवल जलाशय की नहीं— यह लड़ाई है—
पर्यावरण बनाम पूंजी
परिंदों बनाम प्लांट
जल बनाम जहर
आज फैसला सरकार के हाथ में है—
या तो दुनिया को रामसर दिखाए
या आने वाली पीढ़ियों को राख के टीले।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *