लिंगियाडीह में ‘शांतिपूर्ण’ आंदोलन, लेकिन सत्ता के कानों में शांति भंग!

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बैम्बू पोस्ट 24 दिसंबर2025 बिलासपुर।
शहर के विकास की रफ्तार इतनी तेज़ हो चुकी है कि अब गरीबों के घर रास्ते में आने लगे हैं। लिंगियाडीह में आज महिलाओं, बुजुर्गों और प्रभावित परिवारों ने “सांकेतिक एवं शांतिपूर्ण” धरना देकर यही याद दिलाने की कोशिश की कि विकास का मतलब केवल बुलडोज़र, बैनर और फाइलों के आदेश नहीं होता, बल्कि इंसानों की ज़िंदगी भी होती है।
धरना स्थल पर लगा विशाल बैनर अपने आप में एक सरकारी फाइल जैसा दिख रहा था—धारा, आदेश क्रमांक, तिथि और नियमों से भरा हुआ। फर्क बस इतना था कि यह फाइल एसी कमरों में नहीं, धूप में बैठी महिलाओं की गोद में थी।
विकास बनाम गरीब : वही पुरानी कहानी
नगर-निगम द्वारा प्रस्तावित कार्मिशियल कॉम्प्लेक्स और गार्डन अब लिंगियाडीह के लोगों के लिए सपने नहीं, बल्कि डर का दूसरा नाम बन चुके हैं। जिन लोगों से कभी ₹10 प्रति वर्गफुट के हिसाब से प्रीमियम लिया गया, आज वही लोग पूछ रहे हैं—
“पैसा भी लिया, सर्वे भी किया, सूची भी बनाई… अब पट्टा कहाँ गया?”
प्रशासन के रिकॉर्ड बताते हैं कि 505 हितग्राही परिवारों की सूची 2019 में तैयार हो चुकी है, लेकिन 2025 आते-आते पट्टे अब भी ‘फाइलों के गार्डन’ में उग नहीं पाए।
नियम सबके लिए, या सिर्फ़ चुनिंदा इलाकों के लिए?
मोपका, खमतराई, मंगला, बहतराई जैसे इलाकों में जब ₹10 वर्गफुट के हिसाब से पट्टे दिए गए, तब नियम बड़े लचीले थे। लेकिन जैसे ही बात लिंगियाडीह की आई, नियमों को योगासन की मुद्रा में बैठा दिया गया—ना आगे बढ़ते हैं, ना पीछे हटते हैं।
धरने पर बैठी महिलाओं का सवाल सीधा है—
“अगर ज़मीन मास्टर प्लान में आवासीय है, तो फिर गार्डन और कॉम्प्लेक्स हमारे घरों पर ही क्यों?”
मार्च 2025 : बुलडोज़र का ‘विकास पर्व’
मार्च 2025 में 150 से अधिक दुकानें और मकान तोड़ दिए गए। प्रशासन का तर्क—विकास।
स्थानीय लोगों का सवाल—
“अगर यहीं गार्डन और कॉम्प्लेक्स बनना था, तो हमें हटाकर क्यों?
क्या गार्डन सिर्फ़ उजाड़ ज़िंदगियों पर ही खिलता है?”
शांतिपूर्ण आंदोलन, लेकिन तंज़ तीखे
धरना पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, मगर नारों में व्यंग्य साफ़ झलक रहा था—
“गरीब हटाओ, फाइल बढ़ाओ”
“पट्टा कागज़ पर है, ज़मीन बुलडोज़र पर”
राजनीति की चुप्पी
नेताओं की चुप्पी भी उतनी ही गहरी दिखी जितनी धरना स्थल की धूप। चुनाव के समय यही बस्तियाँ “जनसंवाद” का केंद्र बन जाती हैं, लेकिन अब सवाल पूछने पर जवाब सिर्फ़ आश्वासन बनकर रह जाते हैं।
निष्कर्ष
लिंगियाडीह का यह आंदोलन केवल ज़मीन का नहीं, भरोसे का आंदोलन है।
यह धरना प्रशासन को याद दिला रहा है कि
विकास अगर गरीब को बेघर करे,
तो वह विकास नहीं—सिर्फ़ नक्शे पर खिंची एक क्रूर रेखा है।
अब देखना यह है कि यह खबर भी अन्य रिपोर्टों की तरह फाइलों में दबेगी,
या फिर सत्ता के कानों तक पहुँचकर
वास्तविक विकास की नींव

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