

बैम्बू पोस्ट | 7 जनवरी 2026 | बिलासपुर
बिलासपुर ने बीती दोपहर–रात एक बार फिर यह साबित कर दिया कि शहर केवल विकास की रफ्तार से नहीं, धमाकों की गूंज से भी पहचाना जाता है। जब आम नागरिक अपने सपनों को “विकसित” करने में व्यस्त थे, तब विकास ने 132 केवी ट्रांसफॉर्मर के ज़रिये ऐसा जोरदार प्रदर्शन किया कि लोग नींद नहीं, हकीकत में चैतन्य हो गए।
प्रशासन ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए भरोसा दिलाया—
“स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।”
यह बयान ठीक उसी समय जारी हुआ, जब आग की लपटें नियंत्रण रेखा लाँघकर आसमान से सवाल पूछ रही थीं—
अब किस फाइल में जिम्मेदारी दर्ज होगी?
बिजली विभाग का तर्क ऐतिहासिक रहा। उनका कहना है कि “बिजली थी ही नहीं”, फिर भी ट्रांसफॉर्मर जल उठा। यानी यह आग नहीं, आत्मनिर्भर भारत की स्वस्फूर्त उपलब्धि थी—बिना बिजली के जलने की क्षमता!
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार घटनाक्रम बिल्कुल पाठ्यपुस्तक जैसा था—
पहले धमाका,
फिर अफ़रा-तफ़री,
और अंत में प्रशासनिक अमृत वाक्य—
“जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।”
जाँच कब पूरी होगी?
यह सवाल करना भी जाँच के दायरे में आता है।
राजनीति ने भी अपना कर्तव्य निभाया।
एक दल बोला—“यह पिछली सरकार की देन है।”
दूसरा बोला—“हम आएँगे तो सब ठीक कर देंगे।”
और वर्तमान सरकार, हमेशा की तरह, बीच में खड़ी होकर धुआँ देखती रही।
इस आपदा में भी ट्रैफ़िक व्यवस्था ने अनुशासन नहीं छोड़ा।
एक ओर आग धधकती रही,
दूसरी ओर जाम जस का तस।
बिलासपुर ने साबित किया कि शहर में कुछ भी रुक सकता है—
पर जाम नहीं।
निष्कर्ष स्पष्ट है—
शहर पूरी तरह सुरक्षित है।
ख़तरा केवल तब होता है, जब सुरक्षा व्यवस्था अपनी मौजूदगी ज़ोर से दर्ज कराना चाहती है।
अंत में नागरिकों से अपील की गई है कि वे घबराएँ नहीं, सवाल न पूछें और याद रखें—
समस्याएँ धरातल पर नहीं,
फ़ाइलों में सुलझती हैं,
वह भी अगली तारीख़ पर।
