

छाया:शिरीष
बैम्बू पोस्ट 5 दिसंबर 2025, बिलासपुर।
(एनटीपीसी सीपत के उदाहरण से सीख — और सरकार की बंद आँखों पर तीखा सवाल)
जिस देश में सुबह “अतिथि देवो भव” से होती हो और शाम “पिंजरे के पंछी रे” पर खत्म, वहाँ प्रवासी पक्षियों के लिए जगह बची ही कहाँ है? बिलासपुर के कोपरा जलाशय पर आज यही सवाल मंडरा रहा है—परिंदों की उड़ान पर उद्योग का साया, और संरक्षण की फाइलों पर मोटी धूल।
एनटीपीसी सीपत को देख लीजिए—
3000 मेगावाट बिजली, पूरे पश्चिमी भारत को रोशनी; और बदले में—स्थानीय धरती को तपिश, जंगलों को राख, तालाबों को राखड़, और पक्षियों को बेघरपन का “मुफ्त उपहार”। बिजली के साथ गर्मी “एक के साथ एक फ्री” मिली—पर यह फ्री स्कीम सिर्फ इंसानों के लिए नहीं थी, उसकी चोट सबसे पहले परिंदों के पर पर पड़ी।
सीपत की राख ने आकाश को धुंधलाया, झीलों की नीली चादर को灰 से रंग दिया और परिंदों की दाने-पानी वाली उम्मीदों को थका दिया। वे अदालत नहीं जाते, प्रेस नोट नहीं लिखते—बस हर साल लौट आते हैं, उसी भरोसे कि जहाँ वे आए थे, वहीं उन्हें जगह मिलेगी। पर अब वहां बिजली के खम्भे खड़े हैं, कूलिंग टॉवर का धुआँ उड़ रहा है और “विकास” ने उनका आशियाना कब्जा कर लिया है।
अब वही कहानी कोपरा जलाशय के सामने खड़ी है।
सरकारी नीति कहती है—जलाशयों और जलचर-पक्षी क्षेत्रों से उचित दूरी पर ही भारी उद्योग लगेंगे।
जमीनी हकीकत कह रही है—स्टील प्लांट मात्र 6 किलोमीटर दूर खड़ा कर दिया गया!
ना पर्यावरणीय संतुलन की परवाह, ना प्रवासी पक्षियों की उड़ानों की। किताब बंद, मशीन चालू।
कोपरा जलाशय सिर्फ एक पानी का गड्ढा नहीं है, यह हजारों प्रवासी पक्षियों का सर्दियों का घर है।
ये वही मेहमान हैं, जो सुदूर साइबेरिया, मध्य एशिया, ईरान-अफगानिस्तान के रास्तों से हजारों किलोमीटर उड़कर यहाँ आते हैं—सिर्फ इसलिए कि यहाँ उन्हें चैन की नींद, साफ पानी और खुला आसमान मिले। पर अब उनके स्वागत में कटे जंगल, डीज़ल की दुर्गंध और स्टील की गूँज है।
सरकार कहती है—
“पशु-पक्षी भी समुदाय हैं।”
पर संरक्षण योजनाओं में उनका नाम फुटनोट बनकर रह जाता है।
एनटीपीसी का सीएसआर फंड स्कूल-सड़क पर बहता है, पर पक्षियों के लिए
न सकोरे,
न दाने के दाने,
न घोंसले का इंतज़ाम।
परिंदे विकास की सूची में “नॉन-इश्यू” हो गए हैं।
सीपत ने दिखा दिया—
विस्थापन सिर्फ इंसानों का नहीं होता,
सबसे पहले बेघर पंछी होते हैं।
पेड़ कटते हैं तो
पहले घोंसले उजड़ते हैं।
तालाब सूखते हैं तो
पहले परिंदों की प्यास लगती है।
आज कोपरा उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से सीपत गुज़र चुका है।
फर्क बस इतना है कि यहाँ चेतावनी पहले मिल चुकी है—फिर भी सरकार ने आँखें मूँद ली हैं।
सवाल सीधा है—
क्या विकास का मतलब यही है कि
“रोशनी शहरों को मिले और अंधेरा जंगलों के हिस्से आए?”
क्या उद्योग लगाने से पहले
पक्षियों के हिस्से का आसमान छोटा किया जाना ज़रूरी है?
कानून कहता है—
वन्यजीव और जलचरों के आवास की भरपाई और संरक्षण उद्योग की जिम्मेदारी है।
पर कोपरा के परिंदों को आज भी यही पूछा जाना बाकी है—
“आपका वकील कौन है?”
उनकी कचहरी पेड़ों पर लगती है,
फैसले पंखों में सुनाए जाते हैं—
पर सरकार उस अदालत को मान्यता नहीं देती।
सीपत की राख से सबक न लेने का मतलब यही होगा कि
कल कोपरा का आसमान भी उतना ही धुंधला होगा,
जितना आज सीपत का है।
सरकार से मांग बस इतनी सी है—
परिंदों को दया नहीं, हक चाहिए।
जलाशय से उद्योग की दूरी का कानून लागू हो।
प्रवासी पक्षियों के लिए
पानी, दाना, घोंसले और सुरक्षित आसमान सुनिश्चित हो।
वरना इतिहास यही लिखेगा—
मनुष्य ने विकास का दीप जलाया,
और उसी लौ में परिंदों के पंख झुलस गए।
“थोड़ा सा दाना, थोड़ा सा पानी—
इतनी ही है चिड़ियों की कहानी।”
काश सरकार इसे समझ ले,
वरना कोपरा भी सीपत की तरह
राख और आहों का दूसरा नाम बन जाएगा।
