ख़्वाबों की रफ़्तार: 14 साल की उम्र से खिलौना कारों का जुनून, 78 मॉडल और एक ज़िंदगी की ड्राइव

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बैम्बू पोस्ट 15 जनवरी 2026 बिलासपुर।
कई लोगों के लिए खिलौने बचपन की अलमारी में छूट जाते हैं, लेकिन मिस्टर अर्नब घोष के लिए खिलौना कारें सिर्फ़ खेल नहीं, बल्कि सपनों का इंजन बन गईं। महज़ 14 साल की उम्र में शुरू हुआ यह शौक़ आज 2026 तक पहुँचते-पहुंचते 78 अलग-अलग मॉडल की कारों के संग्रह में बदल चुका है—हर कार के साथ एक कहानी, एक सफ़र और एक सीख जुड़ी हुई है।
अर्नब का यह संग्रह किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहा। कोलकाता से शुरू हुई यह यात्रा दिल्ली, मलेशिया और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर तक फैली। हर शहर, हर बाज़ार और हर दुकान ने उनके संग्रह में अलग रंग जोड़ा। कहीं सीमित संस्करण मिला, कहीं विदेशी मॉडल, तो कहीं बचपन की यादों से जुड़ी कार—यह संग्रह भौगोलिक सीमाओं को पार करता हुआ एक जुनून का नक़्शा बन गया।

ख़ास बात यह है कि यह लगाव सिर्फ़ खिलौनों तक सीमित नहीं रहा। 18 वर्ष की उम्र से पिता की कार चलाते हुए अर्नब ने असली स्टीयरिंग की ज़िम्मेदारी को समझा। और फिर 2020 में अपनी पहली कार ख़ुद के पैसे से खरीदना—यह पल उनके लिए शौक़ से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का प्रतीक बना। खिलौना कारों की कतारों में सजी मेहनत, अनुशासन और धैर्य अब असली सड़क पर उतर चुके थे।
अर्नब कहते हैं कि हर मॉडल उन्हें कुछ सिखाता है—डिज़ाइन की बारीकियाँ, इंजीनियरिंग की समझ और सबसे बढ़कर लगन। पारदर्शी बॉक्सों में सलीके से सजी कारें सिर्फ़ संग्रह नहीं, बल्कि यह संदेश हैं कि अगर शौक़ को ईमानदारी से निभाया जाए, तो वही भविष्य की दिशा तय करता है।

आज जब 78 कारें उनकी अलमारी में मुस्कुराती हैं, तो यह कहानी उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने शौक़ को “बेकार” समझकर छोड़ देते हैं। अर्नब का सफ़र बताता है कि शौक़ अगर जुनून बन जाए, तो वह पहचान बन जाता है—और पहचान, एक दिन मंज़िल तक ज़रूर पहुँचाती है।
—यह रिपोर्ट उन सपनों को समर्पित है, जो छोटे खिलौनों से शुरू होकर बड़ी सड़कों तक पहुँचते हैं।

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