कम उम्र, बड़ा बलिदान — लक्ष्मण प्रसाद खंडेलवाल की अधूरी उम्र, पूरी देशभक्ति

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बैम्बू पोस्ट 18 जनवरी 2026 बिलासपुर
बिलासपुर की गलियों में कभी “कल्लामल बृजलाल” की मिठाइयों की खुशबू फैली रहती थी। उसी दुकान के भीतर एक युवा पल रहा था—जिसकी आँखों में मिठास नहीं, आज़ादी का सपना था। नाम था लक्ष्मण प्रसाद खंडेलवाल। उम्र मात्र 23 वर्ष, पर हौसला किसी अनुभवी क्रांतिकारी से कम नहीं।
1930 का दौर था। देश उबल रहा था, सड़कों पर नारे थे और जेलें युवाओं से भर रही थीं। गढ़वाली दिवस के अवसर पर जब ब्रिटिश सैनिक गोल बाजार की गलियों से स्वतंत्रता सेनानियों को घसीटते हुए जेल ले जा रहे थे, तब लक्ष्मण प्रसाद चुप नहीं रह सके। साथियों की गिरफ्तारी ने उनके भीतर सोई चिंगारी को ज्वाला बना दिया।
“भारत माता की जय” और “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारों के साथ उन्होंने स्वयं को अंग्रेज़ी हुकूमत के हवाले कर दिया।
27 सितंबर 1930।
प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट टी.जे.आर. नायडू की अदालत।
धारा 144 और 188 आईपीसी।
चार महीने का कठोर कारावास।
काग़ज़ों में यह एक सज़ा थी, इतिहास में यह एक इम्तिहान था। जेल की दीवारों ने उस युवा शरीर को यातनाएँ दीं, पर आत्मा को झुका नहीं सकीं। चार महीने बाद, 24 जनवरी 1931 को, वे जेल से बाहर आए—पर स्वस्थ नहीं, टूटे हुए शरीर के साथ।
आजादी की कीमत उन्होंने जेल में चुकाई, और शेष क़र्ज़ बीमारी ने वसूल लिया। रिहाई के कुछ ही दिनों बाद लक्ष्मण प्रसाद गंभीर रूप से बीमार पड़े और बहुत कम उम्र में उनका निधन हो गया। वे स्वतंत्र भारत नहीं देख सके, लेकिन स्वतंत्रता की नींव में अपना जीवन रख गए।
लक्ष्मण प्रसाद खंडेलवाल कोई बड़े मंचों पर भाषण देने वाले नेता नहीं थे, न ही इतिहास की किताबों में उनके नाम पर मोटे अध्याय हैं। वे उन अनगिनत युवाओं में से एक थे, जिनके बलिदान से देश खड़ा हुआ।
उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी केवल बड़े नामों से नहीं आती—वह उन गुमनाम चेहरों से आती है, जो सही वक़्त पर सही नारा लगाते हैं, चाहे उसकी कीमत पूरी ज़िंदगी ही क्यों न हो।
लक्ष्मण प्रसाद अमर हैं—क्योंकि उनका बलिदान आज भी हमारी साँसों में ज़िंदा है।

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