
बैम्बू पोस्ट 4 जनवरी 2026 बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के हरे-भरे अंचल में स्थित अचानकमार टाइगर रिज़र्व केवल वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति की सूक्ष्म कलात्मक अभिव्यक्तियों के लिए भी जाना जाना चाहिए। शिवतराई रिसॉर्ट के आसपास खड़े वृक्षों की छाल पर उभरे आकृतियाँ मानो किसी अदृश्य कलाकार की कूँची से बनी हों। यह कोई मानव-निर्मित चित्र नहीं, बल्कि समय, मौसम और जीवन-प्रक्रियाओं का संयुक्त हस्ताक्षर है।
वृक्षों की छाल पर दिखाई देने वाली दरारें, वृत्ताकार रेखाएँ और परतदार बनावटें एक प्राकृतिक कैनवास रचती हैं। कहीं ये आकृतियाँ आँख जैसी प्रतीत होती हैं, कहीं पर्वत-शृंखलाओं की रेखाएँ, तो कहीं नदी की धाराओं का आभास देती हैं। धूप-पानी, तापमान के उतार-चढ़ाव, वृक्ष की आयु और आंतरिक वृद्धि—इन सबके प्रभाव से छाल पर जो पैटर्न उभरते हैं, वे वर्षों में धीरे-धीरे आकार लेते हैं। यही धीमापन इन्हें और अर्थवान बनाता है।
इन प्राकृतिक पेंटिंग्स का सौंदर्य उनकी निःशब्दता में है। वे दर्शक से कुछ कहती नहीं, बल्कि देखने वाले को ठहरकर देखने का निमंत्रण देती हैं। शिवतराई रिसॉर्ट में टहलते हुए जब कोई इन वृक्षों के पास रुकता है, तो उसे एहसास होता है कि जंगल केवल जीवों का घर नहीं, बल्कि स्मृतियों और समय का संग्रहालय भी है। हर दरार एक कथा, हर परत एक मौसम की गवाही देती है।
पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में ये आकृतियाँ हमें यह भी सिखाती हैं कि कला केवल दीवारों पर नहीं होती—वह जीवित प्रणालियों में भी सांस लेती है। इन वृक्षों की रक्षा करना दरअसल इस मौन कला की रक्षा करना है। अचानकमार के जंगलों में उभरी यह प्राकृतिक चित्रकला हमें विनम्र बनाती है और याद दिलाती है कि सबसे महान कलाकार प्रकृति स्वयं है—जो बिना हस्ताक्षर के, बिना प्रदर्शन के, अनवरत रचती रहती है।
