

बैम्बू पोस्ट 5 जनवरी 2026 बिलासपुर।
शिवतराई रिसॉर्ट की सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी कि साल और बरगद के प्राचीन वृक्ष अपनी छाल पर रची प्रेम-कथाएँ दिखाने लगे। यहाँ कोई रंग, कोई ब्रश नहीं—फिर भी प्रकृति की सबसे गहरी अमूर्त चित्रकारी सजीव रूप में उपस्थित है।
करीब से देखने पर वृक्षों की जटिल जड़ें किसी आलिंगन में बंधे युगल-सी प्रतीत होती हैं। मोटी और पतली जड़ें—कहीं एक-दूसरे में लिपटी हुईं, कहीं सहारा बनकर खड़ी—प्रेम के उन रूपों को रेखांकित करती हैं जो शब्दों से परे हैं। छाल पर उभरे घुमाव, दरारें और गाँठें समय के हस्ताक्षर हैं; हर रेखा में धैर्य, हर मोड़ में समर्पण।

एक जगह, दो जड़ों के बीच बना स्वाभाविक खालीपन दिल की धड़कन-सा लगता है—जैसे मौन में संवाद चल रहा हो। दूसरी ओर, उभरी हुई गाँठें किसी स्मृति-चिह्न की तरह हैं—जहाँ वर्षों का साथ जमा होकर ठोस विश्वास बन गया है। कहीं छोटी-सी हरी पत्ती पुराने तने से फूटती दिखती है—यह प्रेम का नवांकुर है, जो बताता है कि उम्र के बावजूद सृजन रुकता नहीं।
छाल की खुरदरी बनावट में भी एक कोमलता है। धूप जब इन सतहों पर तिरछी पड़ती है, तो छायाएँ नए आकार गढ़ती हैं—कभी हृदय-सी आकृति, कभी हथेलियों का स्पर्श। यह प्रकृति की लाइव इंस्टॉलेशन आर्ट है, जो हर पल बदलती है, हर दर्शक को अलग अर्थ देती है।

शिवतराई में यह अनुभव किसी प्रदर्शनी जैसा नहीं, बल्कि एक संवाद जैसा है—मन और जंगल के बीच। यहाँ प्रेम दिखता नहीं, महसूस होता है। पेड़ों की जड़ें बताती हैं कि साथ रहने का अर्थ जकड़ना नहीं, बल्कि सहारा बनना है; समय की दरारें सिखाती हैं कि टूटन भी सौंदर्य रच सकती है।

अचानकमार के इस कोने में प्रकृति स्वयं कलाकार है और जंगल उसकी गैलरी। शिवतराई रिसॉर्ट के वृक्षों पर उकेरी यह अमूर्त प्रेम-चित्रकारी हमें याद दिलाती है—सबसे सच्चा प्रेम वही है जो चुपचाप, निरंतर और निस्वार्थ बढ़ता रहता है
