गुरुनानक पुल के नीचे अरपा नदी में सारसों का जमावड़ा

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बैम्बू पोस्ट 10 जनवरी 2026,बिलासपुर (छत्तीसगढ़), प्रातःकाल।

आज सुबह अरपा नदी के तट पर गुरुनानक पुल के नीचे एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने ठहरकर देखने वालों के मन को शांति और आशा से भर दिया। नदी के उथले जल और हरी घास से आच्छादित मैदान में एशियन ओपनबिल सारसों (घोंघा सारस) का बड़ा झुंड एक साथ दिखाई दिया। दर्जनों सारस कभी धीरे-धीरे चलते, कभी स्थिर खड़े होकर विश्राम करते और कभी अपने विशाल पंख फैलाकर सुनहरी धूप को आत्मसात करते नज़र आए।

सुबह की सैर पर निकले नागरिकों और स्थानीय लोगों के लिए यह दृश्य किसी प्राकृतिक उत्सव से कम नहीं था। हाल के दिनों में अरपा नदी में जलस्तर का स्थिर रहना और आसपास दलदली घास का फैलाव मानो इन पक्षियों के स्वागत में प्रकृति द्वारा बिछाई गई हरित चादर हो। जलीय घोंघों की प्रचुरता ने इस क्षेत्र को ओपनबिल सारसों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भोजन स्थल बना दिया है।

पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं कि एशियन ओपनबिल सारस कोई दूर देश से आया प्रवासी नहीं, बल्कि हमारी धरती का ही स्थायी निवासी है। उपयुक्त भोजन और शांत आवास मिलने पर यह पक्षी बड़े-बड़े समूहों में एकत्र होता है। मानसून के बाद और शीत ऋतु की शुरुआत में ऐसे दृश्य और भी अधिक देखने को मिलते हैं।
यह सारस भारतीय आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का एक मौन प्रहरी है। घोंघों की संख्या को नियंत्रित कर यह प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समूहों में विचरण करता यह पक्षी केवल जैव विविधता का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण और नदी-तटीय भारत के जीवंत प्राकृतिक परिदृश्य की पहचान भी है।

पर्यावरणविदों ने अरपा नदी में सारसों की उपस्थिति को एक सकारात्मक संकेत बताया है, लेकिन साथ ही चेताया है कि नदी किनारे अतिक्रमण, कचरा और जल-प्रदूषण पर नियंत्रण बेहद आवश्यक है। यदि नदी स्वस्थ रहेगी, तो ऐसे दृश्य पीढ़ियों तक जीवित रहेंगे।
एशियन ओपनबिल सारस मध्यम आकार का सुंदर पक्षी है। हल्का धूसर शरीर, काले-सफेद पंख, गुलाबी टाँगें और मोटी चोंच—जिसके बीच का खुला अंतर इसकी अनोखी पहचान है—इसे देखते ही पहचानने योग्य बना देता है। यह दलदल, झील, तालाब, नहर, धान के खेत, नदियों और बाढ़ के मैदानों में समूहों में रहना पसंद करता है।
यह प्रजाति दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की मूल निवासी है—भारत से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम तक फैली हुई। भारत में यह वर्ष भर पायी जाती है और जुलाई से सितंबर के बीच इसका प्रजनन काल होता है।
कभी रामसर पट्टी से जुड़े इलाकों—ग्राम सैदा, बेलमुंडी, कोपरा, सकरा, बूटेना, अमसेना, बहुतराई, पाड़ और सरसेनी—तक सीमित समझे जाने वाले ये पक्षी अब शहरी क्षेत्र में भी दिखाई दे रहे हैं। यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक संदेश है—कि यदि प्रकृति को थोड़ा-सा भी स्थान और सम्मान दिया जाए, तो वह स्वयं लौटकर आती है।
अरपा के तट पर आज दिखे ये सारस जैसे कह रहे हों—
“हम लौट आए हैं… हमें अपनाए रखो।”
सचमुच, यह दृश्य सुखद, आश्वस्त करने वाला और हृदय को छू लेने वाला है।
स्वागत है एशियन ओपनबिल सारस — सुस्वागतम।

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