बैम्बू पोस्ट | 27 फ़रवरी 2026 | बिलासपुर, छत्तीसगढ़
कल दोपहर ठीक 2 बजकर 50 मिनट पर राजधानी के उस गोल गुंबद वाले लोकतांत्रिक भवन में, जहाँ शब्द आमतौर पर नीति बनते हैं, अचानक शब्द ही प्लॉट काटने लगे। बहस किसी और विषय पर थी, पर संवाद ने नक्शा बदल लिया—और देखते ही देखते “जमीन” सदन के बीचोंबीच अंकुरित हो उठी।
दो माननीय—जो प्रायः विकास की इमारतों की ऊँचाई नापते देखे जाते हैं—एक-दूसरे की नाप-जोख करने लगे। माइक ने कुछ क्षण के लिए सिग्नल खो दिया, जैसे वह भी रजिस्ट्री ऑफिस की लाइन में टोकन ढूँढ़ रहा हो। आरोपों की फाइलें ऐसे खुलीं मानो उप-पंजीयक की खिड़की पर अचानक भीड़ बढ़ गई हो। एक स्वर उभरा—“आप तो…!” जवाब आया—“और आप…!” आगे के वाक्य इतिहास की नहीं, हिसाब-किताब की भाषा में थे।
कुर्सियाँ गवाह बनी रहीं, मेजें मौन पंच। काग़ज़ों ने बुद्धिमानी दिखाई—वे चुप रहे। लोकतंत्र की मर्यादा की बाउंड्री वॉल हालांकि मज़बूत निकली; शाम तक पूरी ‘प्लॉटिंग’ कार्यवाही से विलोपित कर दी गई। आधिकारिक डायरी में अब कोई खाली खसरा नहीं—सब कुछ समतल। जो कहा गया, वह रिकॉर्ड पर नहीं; जो सुना गया, वह कानों की निजी संपत्ति।
गलियारों में चर्चा है कि “जमीन” शब्द की बाजार-भाव अचानक चढ़ गई है। राजनीतिक विश्लेषक इसे “शब्द-युद्ध” बता रहे हैं—जहाँ तीर नहीं, टाइटल-डीड चली। जनता का सवाल सीधा है—“यदि सब मिट्टी बराबर कर दिया गया, तो दोष किस सर्वे नंबर में दर्ज होगा?”
सत्ता और विपक्ष—दोनों ने मर्यादा का मानचित्र दिखाया। किसी ने इसे लोकतांत्रिक ऊर्जा कहा, किसी ने ज़ुबान की फिसलन। पर दर्शकदीर्घा के लिए यह वह दोपहर रही, जब विकास की बहस थोड़ी देर के लिए रियल एस्टेट के मुहावरों में बदल गई।
लोकतंत्र की जमीन अभी भी पुख़्ता बताई जाती है। बस, कभी-कभी उस पर बहस की फसल इतनी तेजी से उग आती है कि कैंची को भी ओवरटाइम करना पड़ता है। और फिर शाम होते-होते खेत फिर से समतल—जैसे कुछ हुआ ही न हो।
