
बैम्बू पोस्ट | 28 मई 2026 | बिलासपुर
हाल ही में “राष्ट्रकवि” शब्द के प्रयोग को लेकर सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा इस शब्द पर आपत्ति जताए जाने के बाद स्थानीय कवियों और साहित्यकारों ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रहित, समाजहित और जनजागरण के लिए निरंतर साहित्य सृजन करने वाला व्यक्ति स्वयं को “राष्ट्रकवि” कह सकता है।
साहित्यकारों का कहना है कि जो व्यक्ति कविता लिखता है वह कवि कहलाता है, और जिस राष्ट्र में रहकर वह अपने विचारों, भावनाओं तथा साहित्य का सृजन करता है, वह स्वाभाविक रूप से उस राष्ट्र का कवि होता है। उनके अनुसार यदि कोई कवि वर्षों से देश, समाज और जनहित के विषयों पर रचनात्मक कार्य कर रहा है तो “राष्ट्रकवि” शब्द उसके वैचारिक और भावनात्मक योगदान का प्रतीक माना जा सकता है।
भारतीय साहित्य में “राष्ट्रकवि” कोई औपचारिक सरकारी पदवी नहीं रही है, बल्कि यह जनमानस, साहित्य-जगत और सांस्कृतिक परंपराओं द्वारा दिया गया सम्मान माना जाता है। हिंदी साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त को सबसे अधिक प्रचलित रूप से “राष्ट्रकवि” कहा गया, वहीं रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को भी राष्ट्रीय चेतना, ओज और वीर रस की रचनाओं के कारण यह सम्मान मिला। तमिल साहित्य में सुब्रह्मण्य भारती, कन्नड़ में कुवेम्पु, मराठी में गोविंदाग्रज, गुजराती में झवेरचंद मेघाणी तथा बंगाल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रुल इस्लाम जैसे अनेक साहित्यकारों को जनता ने राष्ट्रभावना के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया।
साहित्यिक परंपराओं में यह सम्मान किसी सरकारी आदेश से अधिक जनस्वीकृति और भावनात्मक जुड़ाव से जुड़ा रहा है। इसी कारण अलग-अलग भाषाओं और प्रदेशों में अनेक कवियों को समय-समय पर “राष्ट्रकवि” कहकर सम्मानित किया गया। माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, कन्हैयालाल सेठिया, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और गोपालदास ‘नीरज’ जैसे साहित्यकारों के नाम भी इस संदर्भ में अक्सर चर्चा में आते रहे हैं।
इस विवाद के संदर्भ में साहित्यकार डॉ. बृजेश सिंह का नाम भी सामने आया है, जो लंबे समय से सामाजिक मुद्दों, जनजागरूकता, राष्ट्रप्रेम और मानवीय मूल्यों पर कविताएं एवं लेख लिखते रहे हैं। वे वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और समाचार माध्यमों के जरिए भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाओं का प्रसार करते रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि इसी आधार पर वे स्वयं को “राष्ट्रकवि” मानते हैं।
साहित्यकारों ने यह भी स्पष्ट किया कि “राष्ट्रकवि” को सरकारी उपाधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक भावनात्मक और वैचारिक पहचान है। उनका कहना है कि साहित्य का मूल उद्देश्य समाज को दिशा देना, जागरूक करना और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करना है। ऐसे में जो साहित्यकार राष्ट्र और समाज की चेतना को अपनी रचनाओं के माध्यम से निरंतर अभिव्यक्त करता है, उसे जनता द्वारा सम्मानित किया जाना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों का भी मानना है कि साहित्य और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तियों के योगदान का सम्मान होना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसे विषयों को विवाद का रूप देने के बजाय साहित्यिक दृष्टि और सकारात्मक सोच के साथ देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रकवि” शब्द पर उठा विवाद, साहित्यकारों ने रखा पक्ष
