एक छत, दो संस्थान, तीन आश्वासन”

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बैम्बू पोस्ट 26 फरवरी 2026 बिलासपुर।
कस्बे की शिक्षा-व्यवस्था इन दिनों प्रयोगशाला बन चुकी है—जहाँ सिद्धांत कम, प्रयोग ज़्यादा हो रहे हैं। सरकारी दस्तावेज़ों में सब कुछ सुव्यवस्थित है: भवन मौजूद, कमरे पर्याप्त, प्रयोगशाला सुसज्जित। ज़मीन पर पहुँचिए तो इमारत मुस्कुरा कर कहती है—“मैं बहुउद्देशीय हूँ जनाब, समय के अनुसार रूप बदल लेती हूँ।”

सुबह का स्कूल, दोपहर का कॉलेज
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एक ही छत के नीचे दो संस्थान ऐसे निभ रहे हैं जैसे लोकतंत्र में वादे—सुबह अलग, शाम अलग।
पहली पाली: मिडिल स्कूल
दूसरी पाली: महाविद्यालय
पाँच वर्षों से चल रही “अस्थायी व्यवस्था” अब स्थायित्व का पुरस्कार पाने की कतार में है। बच्चे समय से पहले पहुँचते हैं, ताकि यह तय कर सकें कि आज वे विद्यार्थी हैं या “समायोजन योजना” के पात्र।

भवन की तलाश—गौठान की ओर प्रस्थान
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कहा गया है कि महाविद्यालय को जल्द ही गौठान वाली ज़मीन पर स्थानांतरित किया जाएगा।
“प्रक्रिया जारी है,” अधिकारी आश्वस्त करते हैं।
यह प्रक्रिया इतनी निरंतर है कि लगता है शिक्षा नहीं, धैर्य का निर्माण हो रहा है। फाइलें दौड़ रही हैं, नोटिंग्स बढ़ रही हैं, और ईंटें—वो अभी भी प्रस्तावों के खाके में सो रही हैं।

कागज़ों का स्वर्ग, ज़मीन का यथार्थ
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रजिस्टर में सब उपस्थित हैं—प्रधानाचार्य, शिक्षक, छात्र।
बस भवन कभी-कभी अनुपस्थित पाया जाता है।
जिस जगह कक्षाएँ होनी थीं, वहाँ कभी गोदाम का सन्नाटा है, तो कभी “अस्थायी” बोर्ड का स्थायी निवास। सुबह की प्रार्थना अब दीवारों से टकरा कर लौट आती है, मानो पूछ रही हो—“हे शिक्षा देवता, आपका वास्तविक पता क्या है?”

अभिभावकों का गणित
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अभिभावक जोड़-घटाव कर रहे हैं—
“एक बच्चा + दो पालियाँ = आधा ध्यान?”
उन्हें बताया जाता है कि सब नियंत्रण में है।
किसका नियंत्रण?
शायद उस घड़ी का, जो हर साल वही तारीख़ दिखाती है—“निर्माण शीघ्र आरंभ होगा।”

चौपाल का दर्शन
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गाँव की चौपाल पर चर्चा गर्म है—
“स्कूल फाइलों के जंगल में भटक गया।”
“नहीं, बजट के बादल बरसे ही नहीं।”
“अरे, योजना का बीज बोया गया था, पर ज़मीन ही किसी और के नाम निकली!”
हर निरीक्षण में नई परत चढ़ती है—आश्वासन की।
और हर परत के नीचे पुरानी दीवारें चुपचाप इंतज़ार करती हैं।

बच्चों का पाठ्यक्रम
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बच्चे अब भूगोल से पहले ‘स्थानांतरण’ सीख रहे हैं।
इतिहास से पहले ‘प्रक्रिया जारी है’ का अर्थ समझ रहे हैं।
नागरिक शास्त्र उन्हें बताता है—“प्रश्न पूछो।”
पर व्यावहारिक जीवन सिखाता है—“उत्तर की प्रतीक्षा करो।”

अंतिम प्रश्न अब भी वही है:

मिडिल स्कूल कहाँ गया?
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शायद वह वहीं है—कागज़ों के स्वर्ग में, जहाँ हर इमारत समय पर बनती है, हर कक्षा सजी रहती है, और हर वादा पूरा होता है।
ज़मीन पर तो फिलहाल शिक्षा मंदिर है—बस मंदिर का रास्ता फाइलों की गलियों से होकर जाता है।
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