
बैम्बू पोस्ट | 29 मई 2026 | बिलासपुर
हाल ही में “राष्ट्रकवि” शब्द के प्रयोग को लेकर सामाजिक और साहित्यिक जगत में बहस तेज हो गई है। विभिन्न साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया पर यह चर्चा चल रही है कि किसी साहित्यकार को “राष्ट्रकवि” की उपाधि देने के मानदंड क्या होने चाहिए। इसी बीच डॉ. बृजेश सिंह को लेकर एक नया मोड़ सामने आया है, जिसने इस विमर्श को और व्यापक बना दिया है।
दरअसल, डॉ. बृजेश सिंह के समर्थन और सम्मान में “बृजेश सिंह चालीसा” नामक एक रचना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। इस चालीसा में उनके राष्ट्रप्रेम, जनहितकारी लेखन, सामाजिक चेतना और साहित्यिक योगदान का वर्णन किया गया है। रचना में उन्हें समाज में जागरूकता फैलाने वाला तथा जनसेवा और सत्य के मार्ग का प्रेरक बताया गया है।
चालीसा की पंक्तियों में डॉ. बृजेश सिंह को “जनहित के धारी”, “राष्ट्रप्रेम की ज्योति जगाने वाले” और “सत्य-पथ का प्रचारक” जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है। साहित्यिक हलकों में इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे एक साहित्यकार के प्रति सम्मान और जनभावना का प्रतीक मान रहे हैं, वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि धार्मिक शैली में किसी जीवित साहित्यकार पर “चालीसा” लिखना साहित्यिक परंपराओं में एक नई और विवादास्पद प्रवृत्ति है।
सोशल मीडिया पर इस विषय पर बहस लगातार जारी है। समर्थकों का कहना है कि डॉ. बृजेश सिंह ने अपने लेखन और सामाजिक सरोकारों के माध्यम से जनचेतना को मजबूत किया है, इसलिए यह सम्मान स्वाभाविक है। वहीं विरोधी पक्ष इसे व्यक्तिपूजा और साहित्यिक मर्यादाओं से जोड़कर देख रहा है।
फिलहाल “बृजेश सिंह चालीसा” ने “राष्ट्रकवि” शब्द को लेकर चल रही बहस को नया आयाम दे दिया है और साहित्यिक जगत में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
