

बैम्बू पोस्ट 19दिसंबर 2025 बिलासपुर।
बिलासपुर के बीचों-बीच टूरिज़्म का सपना बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर मुस्कुराता दिखता है—लकड़ी के कॉटेज, हरियाली, झरने, वन्यजीव और नीचे चमचमाता हेल्पलाइन नंबर। बाहर से देखिए तो लगेगा कि पर्यटक बस टिकट काटने ही वाले हैं। मगर ज़मीनी हकीकत? दरवाज़े के भीतर कुर्सी पर बैठी उदासी, दीवारों पर फीके पोस्टर और सवालों से भरा सन्नाटा।
औचित्य का प्रश्न
छत्तीसगढ़ टूरिज़्म बोर्ड आखिर बना किस लिए?
पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए—या
बैठकों की फोटो, पोस्टरों की छपाई और नारों की सजावट के लिए?
अगर पोस्टर ही पर्यटन होते, तो प्रदेश अब तक ‘विश्व धरोहर’ घोषित हो चुका होता। हर कोने में होर्डिंग है, हर दीवार पर उपलब्धियों की सूची है—पर पर्यटक पूछता है:
“आऊँ तो करूँ क्या? जाऊँ तो कैसे? ठहरूँ तो कहाँ?”
सूचना केंद्र: सूचना कम, प्रतीक्षा ज़्यादा
‘राह पर्यटक सूचना केंद्र’ नाम सुनते ही उम्मीद जगती है। अंदर जाइए—राह तो मिलती है, सूचना नहीं।
बुकिंग? “ऊपर से आएगा।”
गाइड? “सूची बन रही है।”
इवेंट? “पोस्टर में है।”
ग्राउंड पर क्या? “मीटिंग में तय होगा।”
आकर्षण की रणनीति: नारा बनाम रास्ता
पोस्टर कहते हैं—नवीन ऊँचाइयों की ओर।
पर सड़कें कहती हैं—पहले गड्ढों से बचिए।
रिज़ॉर्ट्स दिखते हैं—पर पहुँचने का साधन अस्पष्ट।
त्योहारों का ज़िक्र है—पर कैलेंडर गायब।
बैठकों का पर्यटन
टूरिज़्म बोर्ड की सबसे स्थायी उपलब्धि: नियमित बैठकें।
एजेंडा हर बार नया, निष्कर्ष हर बार पुराना—
“समन्वय होगा”, “योजना बनेगी”, “अगली बैठक में समीक्षा”।
पर्यटक meanwhile—अगले राज्य में छुट्टी मना चुका।
समाधान पोस्टर में नहीं, सिस्टम में
अगर वाकई पर्यटक चाहिए, तो—

एकीकृत बुकिंग (बस–ट्रेन–ठहराव–गाइड)
रीयल-टाइम जानकारी (खुला/बंद, मौसम, इवेंट)
स्थानीय अनुभव (खाना, संस्कृति, होम-स्टे)
ग्राउंड प्रमोशन (इन्फ्लुएंसर टूर नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर टूर)
उत्तरदायी सूचना केंद्र (खुला दरवाज़ा, सक्रिय काउंटर)
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में पर्यटन की संभावना पोस्टर जितनी बड़ी है—बस उसे ज़मीन तक उतारना बाकी है।
वरना टूरिज़्म बोर्ड यूँ ही सवालों के सामने बैठा रहेगा—
और पर्यटक, जवाब खोजते-खोजते, किसी और राज्य की यादों में खो जाएगा।
