
बैम्बू पोस्ट 23 फ़रवरी 2026 बिलासपुर।
आठ मार्च को जब पूरी दुनिया International Women’s Day मनाने की तैयारी में थी, तब हमारे शहर की साहित्यिक समिति ने एक ऐतिहासिक घोषणा की — “इस माह की काव्य गोष्ठी महिला दिवस पर केन्द्रित रहेगी, और मंच पर आमंत्रित रहेंगे… केवल पुरुष कवि!”
सूत्रों के अनुसार यह निर्णय “महिलाओं की भावनाओं को गहराई से समझने” की अद्भुत क्षमता के आधार पर लिया गया। आयोजकों का मानना है कि वर्षों से “नारी तुम केवल श्रद्धा हो” पढ़ते-पढ़ते पुरुष कवि अब विशेषज्ञ स्तर पर पहुँच चुके हैं।
गोष्ठी में एक कवि ने मंच से घोषणा की —
“मैंने आज तक बर्तन नहीं मांजे, पर स्त्री-श्रम पर मेरी कविता सुनिए!”
दूसरे कवि ने भावुक होकर कहा —
“मैं नारी-शक्ति का सम्मान करता हूँ, इसलिए आज घर से निकलते वक्त पत्नी से इजाज़त भी ली।”
दर्शक दीर्घा में बैठी महिलाओं ने तालियाँ तो बजाईं, पर उनके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो अक्सर बजट भाषण सुनते समय आती है — आशावादी भी, संशयग्रस्त भी।
विशेष आकर्षण यह रहा कि मंच पर “स्त्री सशक्तिकरण” पर चर्चा करते हुए अधिकांश कवियों ने माइक अपने हाथ से नहीं छोड़ा। बीच-बीच में यह भी बताया गया कि “नारी अब चाँद पर पहुँच चुकी है”, हालांकि कार्यक्रम स्थल तक पहुँचने के लिए किसी महिला कवयित्री को निमंत्रण पत्र नहीं मिला।
समिति अध्यक्ष ने समापन भाषण में कहा —
“हमने महिला दिवस पर महिलाओं को सम्मान देने का प्रयास किया है, इसलिए उन्हें आराम दिया गया है। आज मंच की जिम्मेदारी पुरुषों ने उठा ली है।”
उधर शहर की कुछ महिला रचनाकारों ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा —
“अगले महीने ‘पुरुष संवेदना दिवस’ पर हम भी मंच संभालेंगे — और पुरुषों को घर पर आराम देंगे।”
फिलहाल, महिला दिवस की इस विशेष गोष्ठी ने यह सिद्ध कर दिया कि संवेदनाओं का ठेका भी अब जेंडर-न्यूट्रल नहीं रहा — बस निमंत्रण कार्ड थोड़ा एकतरफा छप गया था।
