
बिलासपुर से सांस्कृतिक संवाददाता की रिपोर्ट
14 फ़रवरी तक रियासी इलाक़ों की बहुमंज़िली छतें प्रेम की प्रतीक्षा और कविता की गूँज से गुलज़ार रहीं। शाम की मद्धिम रोशनी में गुलाब थामे युवा जब ग़ज़लों के शेर दोहराते दिखे—
“तुम छत पर आओ तो वही गुलाब लेकर आना…
जब भी पुकारूँ ख़ामोशी से—तुम धड़कन बनकर आना।”
—तो लगा मानो प्रेम बाहरी प्रदर्शन से उठकर भीतर की साधना बन गया हो।
पर कैलेंडर का पन्ना पलटते ही 15 फ़रवरी को महाशिवरात्रि का आगमन इस भाव-जगत को एक नई दिशा देता है। छतों की चहल-पहल से मंदिरों की घंटियों तक का यह संक्रमण केवल तिथि का परिवर्तन नहीं, बल्कि अनुभूति का विस्तार है। जहाँ एक ओर वेलेंटाइन डे ने प्रेम को धड़कनों में खोजा, वहीं महाशिवरात्रि उसे ध्यान और तांडव के संतुलन में देखने का अवसर देती है।
स्थानीय साहित्यकारों का मानना है कि यह संयोग प्रतीकात्मक है—
प्रेम यदि प्रतीक्षा है, तो शिव उसकी तपस्या हैं।
प्रेम यदि मिलन है, तो शिव-शक्ति उसका शाश्वत स्वरूप।
वेलेंटाइन की रातों में जिन छतों पर युवा कहते रहे—
“मुलाक़ात मुकम्मल होगी, ज़रा इंतज़ार की करवट तो बदल…”
उन्हीं इलाक़ों में अब शिवालयों में रुद्राभिषेक और जागरण की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। तालाब के उफ़ान और समंदर की लहरों के रूपक अब गंगाजल की धारा में बदलते दिखाई दे रहे हैं।
समाजशास्त्रियों के अनुसार, यह दृश्य भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण है—जहाँ प्रेम और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
वेलेंटाइन डे ने जहाँ संबंधों को निजी संवेदना दी, वहीं महाशिवरात्रि उन्हें आत्मिक आयाम प्रदान करती है।
रात की चादर तले जब चाँद प्रश्न बनकर उभरता है, तब शिव का ध्यान उत्तर बन जाता है।
प्रेम की धड़कन से शुरू हुई यह यात्रा अंततः ध्यान की निस्तब्धता में पहुँचती है।
इस तरह 14 से 15 फ़रवरी का यह क्रम केवल दो पर्वों का मेल नहीं—यह संदेश है कि सच्चा प्रेम, अंततः साधना ही है।
छतों की कविताएँ और मंदिरों की मंत्रध्वनि—दोनों मिलकर कहती हैं:
प्रेम जब भीतर उतरता है, तभी वह शिवत्व को छूता है।
