
बैम्बू पोस्ट 18 मार्च 2026 बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
बिलासपुर के बिलासा देवी केवट हवाई अड्डा से उड़ान भरने से पहले का दृश्य इन दिनों कुछ अलग ही दार्शनिक ऊँचाइयों को छूता दिखाई दिया। कारण थे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती — जो केवल आकाश में उड़ने नहीं, बल्कि विचारों को भी ऊँचाई देने के लिए जाने जाते हैं।
बोदरी स्थित भगवान परशुराम भवन में जब कांग्रेसी भक्तगण एकत्र हुए, तो उन्हें लगा कि वे कोई राजनीतिक प्रवचन सुनने आए हैं। परंतु शंकराचार्य जी ने मंच संभालते ही मानो “राजनीति रूपी माया” का ऐसा विश्लेषण किया कि श्रोता क्षण भर को अपने ही विचारों पर संदेह करने लगे।


उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—
“जब नेता धर्म की बात करते हैं, तो वह चुनाव होता है; और जब संत राजनीति पर बोलते हैं, तो वह ‘विवाद’ कहलाता है। यह कैसी अद्भुत लीला है!”
सभा में हल्की हंसी गूंजी, पर तंज़ की गहराई ने कई चेहरों पर गंभीरता भी ला दी।
आगे उन्होंने जोड़ा—
“कांग्रेस हो या कोई और दल, भक्तों की संख्या बढ़ाने में सब लगे हैं— फर्क सिर्फ इतना है कि कोई वोट मांगता है, कोई मोक्ष।”
यह सुनकर उपस्थित लोगों के बीच एक अद्भुत द्वंद्व पैदा हो गया—तालियाँ बजाएँ या आत्मचिंतन करें।

शंकराचार्य जी का यह दार्शनिक व्यंग्य केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं था, बल्कि आधुनिक समाज के उस द्वैत पर भी प्रश्न था, जहाँ धर्म और सत्ता एक-दूसरे की छाया बनकर चलते हैं।
अंत में, हवाई अड्डे की ओर बढ़ते हुए उन्होंने हल्के अंदाज़ में कहा—
“जहाज में चढ़ने से पहले वजन तौला जाता है, काश विचारों का भी तौल होता—तो कई लोग ज़मीन पर ही रह जाते।”
और फिर वे उड़ चले—केवल एक यात्रा पर नहीं, बल्कि पीछे छोड़ गए सवालों का एक ऐसा आकाश, जिसमें हर कोई अपने-अपने उत्तर खोजने को मजबूर है।
