
बैम्बू पोस्ट 29 मार्च 2026 बिलासपुर।
बिलासपुर जिले के कोटा क्षेत्र में पर्यटन का नया मॉडल सामने आया है—“इको जोहार रिसॉर्ट” में प्रकृति से जुड़ने का अनुभव इतना गहरा हो गया कि मेहमानों के लिए जंगल ही थाली में परोस दिया गया। फर्क बस इतना रह गया कि हिरण ने इस ‘आतिथ्य’ के लिए अपनी सहमति नहीं दी थी।
सूत्रों के अनुसार, बेलगहना के कुरदर स्थित इस रिसॉर्ट में शुक्रवार को किचन में कुछ ऐसा पक रहा था, जिसकी खुशबू सीधे वन विभाग तक पहुंच गई। टीम ने जब छापा मारा, तो कड़ाही में ‘स्पेशल डिश’ उबल रही थी—जिसे देखकर अधिकारियों ने भी सोचा होगा, “ये मेन्यू तो जंगल बुक में भी नहीं था!”
रिसॉर्ट प्रबंधन का तर्क भी कम दिलचस्प नहीं रहा। मैनेजर साहब ने बड़ी मासूमियत से कहा—“हमें नहीं पता मांस किसका है।” यानी कड़ाही में क्या पक रहा है, यह जानना शायद उनके जॉब प्रोफाइल में शामिल नहीं था। उधर कुक रामकुमार टोप्पो ने जिम्मेदारी आगे बढ़ाते हुए कहा कि मांस तो उन्हें गांव से पत्ते में ‘गिफ्ट पैक’ होकर मिला था। अब यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह ‘डिलीवरी’ किसी फूड ऐप से आई थी या जंगल की किसी ‘ऑफलाइन सर्विस’ से।
गांव वालों का दावा है कि यह कोई पहली बार नहीं है। रिसॉर्ट में आने वाले पर्यटक शायद “नेचर वॉक” के साथ “नेचर खाओ” पैकेज का भी आनंद लेते रहे हैं। मुर्गा-बकरा तो शहर में मिल ही जाता है, यहां लोग कुछ ‘एक्सक्लूसिव’ खाने आते हैं—ऐसा स्थानीय ज्ञान बताता है।
वन विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और मांस को जांच के लिए भेज दिया है। अब लैब बताएगी कि कड़ाही में पक रही ‘कहानी’ सच में हिरण की थी या फिर कोई और ‘मासूम किरदार’ था।
इस बीच, जंगल के बाकी जानवरों ने राहत की सांस ली है—कम से कम फिलहाल के लिए उनका नाम मेन्यू से हटा दिया गया है।
जब पर्यटन ‘इको’ से ‘इकोनॉमिक’ बन जाए और जंगल थाली में सिमट जाए, तो समझ लीजिए कि इंसान ने प्रकृति से रिश्ता नहीं, बल्कि ‘रेसिपी’ बना लिया है
“रिसॉर्ट में ‘वन्य स्वाद’ का स्पेशल मेन्यू: हिरण गया, मैनेजर आया सलाखों के भीतर”
