नल खुला है, मगर जागरूकता पूरी है

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25 अप्रैल 2016—देश अभी-अभी “जल बचाओ” के नारे से तर-बतर हुआ है। विश्व जल दिवस बीते कुछ दिन ही हुए हैं, और मंचों पर बहाए गए ज्ञान के झरने अभी सूखे नहीं हैं। इस वर्ष का विषय था— “ग्लेशियर संरक्षण”। यानी बर्फ पिघल रही है, लेकिन हमारी संवेदनाएँ उससे भी तेज़ी से पिघल रही हैं।
मंचों पर बड़े-बड़े विद्वान आए, उन्होंने जल संकट पर चिंता जताई। श्रोताओं ने भी पूरी निष्ठा से सिर हिलाया—इतनी निष्ठा शायद घर के नल बंद करते समय भी नहीं दिखती। कार्यक्रम खत्म हुआ, चाय-बिस्किट आए, फोटो खिंची, और “जल संरक्षण” वहीं प्लेट में रखे बिस्किट की तरह खत्म हो गया।
अथर्ववेद कहता है— “माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः”।
हम पृथ्वी के पुत्र हैं।
और पुत्र होने का फर्ज़ हम बखूबी निभा रहे हैं—माता के संसाधनों का खुलकर दोहन करके।
सच तो यह है कि पृथ्वी पर पीने योग्य जल 1% से भी कम बचा है। लेकिन हमारी जीवनशैली देखकर लगता है कि शायद हमें कोई गुप्त सूचना मिली है कि 99% पानी हमारे लिए रिजर्व रखा गया है।
सोशल मीडिया पर “जल है तो कल है” लिखना आजकल सबसे आसान काम है। बस स्टेटस अपडेट किया और कर्तव्य पूरा। उसके बाद घर के बाहर नल खुला छोड़ देना—ताकि पड़ोसियों को भी पता चले कि हम कितने ‘जागरूक’ हैं।
गाड़ियों की धुलाई में सैकड़ों लीटर पानी बहाना अब शान की बात है। जितना ज्यादा पानी बहे, उतनी ही ज्यादा चमक गाड़ी में नहीं, बल्कि मालिक की ‘प्रतिष्ठा’ में दिखती है। झाड़ू लगाकर काम चल सकता है—यह विचार शायद हमारे आधुनिक जीवन के स्तर से नीचे का माना जाता है।
अब ज़रा ज़मीनी हकीकत पर आइए—
राजकिशोर नगर से बजरंग चौक वसंत विहार तक सड़क निर्माण कार्य चल रहा है। दावा किया गया कि डिवाइडर की सिंचाई के लिए ट्रीटमेंट प्लांट का पानी इस्तेमाल हो रहा है। सुनने में कितना अच्छा लगता है—जैसे कोई आदर्श योजना ज़मीन पर उतर आई हो।
लेकिन असलियत?
तोरवा पंप हाउस से टैंकर भर-भरकर वही कीमती पानी लाया जा रहा है, जिसे बचाने के लिए भाषण दिए गए थे। यानी मंच पर संरक्षण, मैदान में दोहन—दोनों का संतुलन शानदार तरीके से बना हुआ है।
यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक मानसिकता का आईना है। हम योजनाएँ बनाते हैं, घोषणाएँ करते हैं, और फिर उन्हें बड़े आराम से अनदेखा कर देते हैं—मानो वे सिर्फ कहने के लिए थीं, करने के लिए नहीं।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि जल संकट आएगा या नहीं।
सवाल यह है कि जब संकट आएगा, तब भी क्या हम उसी तरह नल खुला छोड़कर उसका स्वागत करेंगे?
अंत में एक छोटा-सा, मगर असुविधाजनक सुझाव—
जल संरक्षण को भाषणों से निकालकर आदतों में शामिल कर लीजिए।
क्योंकि सच यही है—
अगर हमने अब भी पानी को हल्के में लिया, तो आने वाला समय हमें बहुत भारी पड़ेगा।
जल बचाइए—वरना भविष्य आपको नहीं बचाएगा

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