गाली की रफ़्तार और गिरती संवाद-संस्कृति”

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बैम्बू पोस्ट 29/11/2025 ,बिलासपुर।

शहर आज फिर शब्दों के शोर से जागा—
हर गली, हर चौराहा मानो गुस्से का मंच सजा।
बात-बात पर माँ-बहन की गालियाँ तैरती मिलीं,
जुबान से निकलता ज़हर—तमीज़ की जड़ों को छीलती मिलीं।

राह चलते संवाद अचानक युद्ध बने,
तर्क पीछे हटे—अभद्र वाक्य ही आगे तने।
रिक्शा स्टैंड से लेकर सोशल मीडिया की दीवार,
हर जगह बहस नहीं—बस अपमान का हथियार।

रिपोर्टर ने जब घटनास्थल समझा समाज को—
सुना कि छोटी सी नोक-झोंक ने
शब्दों का दंगल खड़ा किया,
जहाँ सम्मान घायल पड़ा और
विवेक एंबुलेंस का रास्ता देखता रह गया।

लोग कहते मिले—
“गुस्सा बहुत है, सहनशक्ति कम,”
और भाषा बन गई है
मन की भड़ास निकालने का बम।
किंतु किसी ने यह नहीं पूछा
कि गाली देकर
क्या सचमुच दबाव घटता है,
या आग में घी डालकर
लपट और फैलता है?

ज्योतिष का तंज भी इस कथा में दर्ज है—
“राहू का कोप वाणी बिगाड़ने पर बढ़ता है,”
बुज़ुर्ग पंडित समझाते दिखे,
“शब्द कर्म होते हैं—
जैसे बोओगे, वैसा फल चखोगे—
गाली उगेगी तो काँटे ही मिलेंगे।”

समाजशास्त्रियों की टिप्पणी आई—
“यह भाषा-हिंसा सिर्फ शब्द नहीं,
मानसिक चोट का पहला वार है।”
बच्चों के कानों पर
जब अपशब्दों की बारिश पड़ती है,
तो संस्कार छतरी ढूँढ़ते हैं
पर मिलती कहीं नहीं।

स्कूल के शिक्षक कहते हैं—
“संवाद सिखाइए,
गाली नहीं।”
पर मोहल्ले के चौपाल में
बोलचाल का पाठ्यक्रम उल्टा पढ़ाया जा रहा—
जहाँ चीख जीत होती है
और शालीनता हार।

डिजिटल गलियारों में रिपोर्टर का कैमरा घूमता है—
कमेंट सेक्शन
अब शब्दों का कबाड़ख़ाना दिखता है,
जहाँ तर्क के ढेर पर
गाली की बोतलें टूटी पड़ी हैं
और विवेक का कूड़ादान भरता जा रहा है।

एक बुज़ुर्ग महिला की आवाज़
रिपोर्ट में दर्ज हुई—
“बेटा, पहले झगड़ा भी
इज़्ज़त की हद में होता था,
आज तो ज़ुबान बिना सरहद के
लौह-हथियार बन चुकी है।”

रिपोर्टिंग अब सवाल उठाती है—
क्या सचमुच गाली
कमज़ोरी का शॉर्टकट है?
क्या निर्भीकता का मतलब
बेशर्मी होना है?
या फिर हमने
आसान रास्ता चुन लिया है—
जहाँ सोचने की मेहनत छोड़कर
सीधे अपमान बोल दिया जाता है?

विशेषज्ञों का साझा निष्कर्ष छपने योग्य है—
“यदि वाणी को संयम का अनुशासन मिला,
तो विवाद संवाद में बदलेगा।”
वरना राहू नहीं,
हमारी ही बिगड़ी ज़ुबान
कर्मफल बनकर
समाज के माथे पर लिखेगी
अशांति की इबारत।

गाली की गति तेज़ है,
पर सभ्यता की चाल धीमी—
यदि आज शब्द सँभाले नहीं,
तो कल संवाद सिर्फ
अख़बारों की पुरानी सुर्खियों में
याद बनकर रह जाएगा।
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