जनता के कंधे पर राजनीति की बंदूक, विदेशी ब्रांडों पर अटूट भरोसा!

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बैम्बू पोस्ट 14 जुलाई 2026 बिलासपुर। राजनीति भी गजब का खेल है। मंच से विदेशी प्रभाव के खिलाफ गरजने वाले कई चेहरे, मंच से उतरते ही विदेशी ब्रांडों की चमक में खोए दिखाई देते हैं। जनता को स्वदेशी का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन प्रतिष्ठा का पैमाना अक्सर विदेशी स्कूल, विदेशी विश्वविद्यालय, विदेशी अस्पताल, विदेशी गैजेट और विदेशी जीवनशैली बन जाते हैं।
बड़े राष्ट्रीय संस्थानों पर सवाल उठाकर जनता में आक्रोश पैदा करना अब राजनीति का आसान फार्मूला बनता जा रहा है। ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो देश की हर समस्या की जड़ वही संस्थान हों। चुनावी मौसम आते ही जनता के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक निशाने साधे जाते हैं और सत्ता की रोटियां सेंकी जाती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जिन विदेशी प्रभावों के खिलाफ भाषण दिए जाते हैं, व्यवहार में उन्हीं पर सबसे अधिक भरोसा दिखाई देता है। बच्चों की पढ़ाई के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी वाले स्कूल, उच्च शिक्षा के लिए विदेशी सहयोग वाले संस्थान, इलाज के लिए अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से जुड़े अस्पताल और विकास के लिए विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक, JICA, UNICEF तथा WHO जैसी संस्थाओं के सहयोग से चलने वाली योजनाओं का लाभ लेने में किसी को संकोच नहीं होता। हजारों सामाजिक संस्थाएं भी विदेशी अनुदान लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम कर रही हैं।
उधर घरों की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं है। हाथ में विदेशी मोबाइल, सामने विदेशी स्मार्ट टीवी, रसोई में विदेशी कॉफी मशीन, अलमारी में विदेशी कॉस्मेटिक्स, बच्चों के विदेशी खिलौने और सोशल मीडिया पर स्वदेशी बनाम विदेशी का लंबा प्रवचन। विरोध के नारे भी विदेशी ऐप पर और क्रांति की पोस्ट भी विदेशी तकनीक के सहारे।
यही विरोधाभास अब सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने है। यदि विदेशी सहयोग इतना ही आपत्तिजनक है तो फिर विदेशी तकनीक, विदेशी शिक्षा, विदेशी चिकित्सा सहयोग, विदेशी निवेश और विदेशी ब्रांडों पर बढ़ती निर्भरता को सामाजिक प्रतिष्ठा क्यों माना जा रहा है? और यदि इनका उपयोग विकास के लिए आवश्यक है, तो फिर जनता को भावनात्मक नारों से भ्रमित करने की राजनीति क्यों?
लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना और भ्रम फैलाने में अंतर होता है। संस्थाओं का मूल्यांकन उनके काम, पारदर्शिता और जनहित के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक सुविधा के हिसाब से। वरना जनता के हिस्से में केवल नारे आएंगे और नेताओं के हिस्से में सुर्खियां।

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