
बैम्बू पोस्ट 15 सितंबर 2026 बिलासपुर, रायपुर।
छत्तीसगढ़ में तीज-त्योहारों का पर्व पूरे उत्साह, श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। गांवों से लेकर शहरों तक मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ। घर-आंगन में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पर्व मनाने की पुरानी परंपरा एक बार फिर जीवंत दिखाई दी। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की तथा लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का सुंदर संगम देखने को मिला।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में तीज-त्योहारों का विशेष स्थान है। यहां पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप, पारिवारिक आत्मीयता और लोकपरंपराओं को भी मजबूत करते हैं। तीज जैसे पर्व में शिव-पार्वती की आराधना के माध्यम से दांपत्य जीवन की मंगलकामना, पारिवारिक सुख-शांति और मनोकामना की पूर्ति की प्रार्थना की जाती है।
धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध शक्ति और चेतना के मिलन का प्रतीक माना जाता है। शिव को चेतना तथा पार्वती को शक्ति का स्वरूप मानने की परंपरा भारतीय दर्शन में गहरी जड़ें रखती है। इस दृष्टि से तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में प्रेम, संयम, समर्पण और संतुलन के महत्व को स्मरण कराने वाला अवसर भी है।
भारतीय दर्शन में त्योहारों का महत्व इस बात में भी निहित है कि वे मनुष्य को अपनी दैनिक व्यस्तताओं से कुछ समय निकालकर आत्मचिंतन और सामूहिक जीवन की ओर लौटने का अवसर देते हैं। व्रत को केवल शारीरिक संयम न मानकर इच्छाओं पर नियंत्रण और मन की एकाग्रता से जोड़कर देखा गया है। पूजा-अर्चना के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर श्रद्धा, करुणा, धैर्य और आत्मसंयम जैसे मूल्यों को जागृत करने का प्रयास करता है।
छत्तीसगढ़ में इन पर्वों के दौरान लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों और रीति-रिवाजों की भी विशेष छटा दिखाई दी। सखियों और महिलाओं के समूहों ने तीज के पारंपरिक गीत गाए। मायके और ससुराल के रिश्तों में आत्मीयता बढ़ाने वाली परंपराओं ने सामाजिक संबंधों को नई ऊष्मा दी। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा और धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
इन त्योहारों का एक महत्वपूर्ण पक्ष लोक और अध्यात्म का समन्वय भी है। मंदिरों में बजती घंटियां, घरों में जलते दीप, पूजा की थाली और लोकगीत—ये सभी मिलकर उस सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करते हैं जिसमें धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ और संबंधों को आत्मीयता देने वाली परंपरा है।
तेज गति से बदलते सामाजिक परिवेश में भी छत्तीसगढ़ के तीज-त्योहार यह संदेश देते हैं कि आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। पर्व समाप्त हो जाते हैं, लेकिन उनके माध्यम से मिले आस्था, संयम, प्रेम, प्रकृति-सम्मान और पारिवारिक एकता के संदेश लंबे समय तक जीवन में बने रहते हैं।
इस प्रकार छत्तीसगढ़ में मनाए गए तीज-त्योहार धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और भारतीय जीवन-दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति बनकर सामने आए।
