
बैम्बू पोस्ट 6अक्टूबर2026 बिलासपुर।
विशेष समाचार | व्यंग्यात्मक टिप्पणी
रावण दहन को लेकर राजनीति में इस बार ऐसा मोड़ आया है, जिसकी शायद स्वयं रावण ने भी कल्पना नहीं की होगी। हालाँकि किसी दूसरे संदर्भ में कांग्रेस के एक नेता ने एक समाचार में यह कह दिया कि ‘आरपांचल में शासकीय रावण दहन होगा।’ बयान सामने आते ही सवाल उठने लगे हैं कि आखिर अब रावण के पुतले का दहन भी सरकार के जिम्मे होगा या फिर इसके लिए भी कोई विभाग, बजट और निविदा जारी होगी?
देश में सरकारी योजनाओं की लंबी सूची पहले से मौजूद है। अब यदि रावण दहन भी शासकीय कार्यक्रम की श्रेणी में शामिल हो जाए तो इसे प्रशासनिक उपलब्धि माना जाए या लोकतंत्र के उत्सव में एक और सरकारी मुहर?
विडंबना देखिए—जिस रावण को हर वर्ष बुराई, अहंकार, अत्याचार और अधर्म का प्रतीक मानकर जलाया जाता है, उसी रावण के दहन को लेकर अब राजनीति में बयानबाजी शुरू हो गई है। ऐसा लगता है कि रावण का पुतला मैदान में खड़ा होने से पहले ही राजनीतिक मंच पर अपनी भूमिका निभाने लगा है।
सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में इस पर भी गंभीर चर्चा हो सकती है कि रावण दहन का उद्घाटन कौन करेगा, मुख्य अतिथि कौन होगा, मंच पर किसका भाषण कितना लंबा होगा और पुतले में आग लगाने का ‘श्रेय’ किसे मिलेगा। संभव है कि इसके लिए भी बाकायदा प्रोटोकॉल बनाया जाए—पहले फीता कटेगा, फिर दीप प्रज्वलित होगा, फिर भाषण होंगे और अंत में रावण दहन होगा।
जनता शायद यह पूछने की स्थिति में भी पहुँच जाए कि रावण जलाने के लिए भी सरकारी प्रमाणपत्र आवश्यक होगा क्या?
राजनीति की विडंबना यह है कि दशहरे का मूल संदेश बहुत सरल था—बुराई पर अच्छाई की जीत। लेकिन अब इस सरल संदेश के बीच राजनीति ने इतने प्रश्न खड़े कर दिए हैं कि जनता सोचने लगी है कि असली रावण पुतले में है या व्यवस्था के उन हिस्सों में, जिन्हें हर साल जलाने की घोषणा तो होती है, मगर वे अगले वर्ष पहले से अधिक मजबूत होकर वापस खड़े दिखाई देते हैं।
हर साल रावण का पुतला ऊँचा होता जा रहा है। आतिशबाजी बढ़ रही है। मंच बड़े हो रहे हैं। भाषण लंबे हो रहे हैं। नेताओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन सवाल वही है—क्या रावण भी घट रहा है?
यदि रावण केवल दस सिरों वाला पुतला है तो उसे जलाना सबसे आसान काम है। मुश्किल तो उन दस सिरों को पहचानना है जो समाज और सत्ता के भीतर अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं—अहंकार, भ्रष्टाचार, लालच, झूठ, अन्याय, अवसरवाद, भाई-भतीजावाद, हिंसा, दिखावा और सत्ता का मद।
इनमें से किसी एक सिर पर आग लगाने की हिम्मत कितने लोग करेंगे?
यही कारण है कि ‘शासकीय रावण दहन’ का विचार अपने आप में एक दिलचस्प राजनीतिक व्यंग्य बन गया है। क्योंकि यदि सरकार ही रावण जलाएगी, तो जनता के मन में स्वाभाविक सवाल उठेगा—क्या सरकार रावण को केवल पुतले में ढूँढ़ेगी या व्यवस्था के भीतर भी?
और अगर सरकारी आयोजन है तो फिर निमंत्रण-पत्र भी सरकारी होंगे, मंच भी सरकारी होगा, सुरक्षा भी सरकारी होगी और संभव है कि रावण की ऊँचाई भी किसी सरकारी फाइल में तय हो।
हो सकता है भविष्य में इसकी भी घोषणा हो—
‘रावण दहन कार्यक्रम हेतु विशेष समिति गठित।’
फिर समिति की बैठक होगी।
बैठक के बाद उपसमिति बनेगी।
उपसमिति के बाद स्थल निरीक्षण होगा।
निरीक्षण के बाद रिपोर्ट बनेगी।
रिपोर्ट के बाद स्वीकृति आएगी।
स्वीकृति के बाद बजट जारी होगा।
और जब तक पूरी प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक रावण बेचारा खुद सोचने लगेगा—
‘मुझे जलना है या सरकारी प्रक्रिया में फाइल बनकर रह जाना है?’
व्यंग्य यहीं खत्म नहीं होता।
यदि ‘शासकीय रावण दहन’ वास्तव में राजनीतिक आयोजन बनने जा रहा है तो फिर यह भी तय होना चाहिए कि रावण के दस सिरों में कौन-कौन से राजनीतिक मुद्दे लगाए जाएँगे। एक सिर महँगाई का, दूसरा बेरोजगारी का, तीसरा भ्रष्टाचार का, चौथा अपराध का, पाँचवाँ प्रशासनिक लापरवाही का और बाकी सिर चुनावी वादों के लिए सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
हालाँकि एक खतरा जरूर रहेगा—रावण जल जाएगा, लेकिन उसके सिरों पर लिखे मुद्दे कहीं अगले दिन फिर से जिंदा न हो जाएँ।
जनता वर्षों से यह दृश्य देख रही है। मंच पर नेता आते हैं, रावण के पुतले को देखते हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत की बात करते हैं, आतिशबाजी होती है और पुतला राख हो जाता है। अगले दिन वही जनता अपने पुराने सवालों के साथ फिर खड़ी रहती है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि ‘आरपांचल में शासकीय रावण दहन होगा या नहीं।’
असली सवाल यह है कि रावण दहन के बाद क्या होगा?
क्या केवल पुतला जलेगा?
या अहंकार भी जलेगा?
क्या आतिशबाजी खत्म होते ही भ्रष्टाचार फिर मुस्कुराएगा?
क्या मंच से उतरते ही राजनीतिक वादे भी राख हो जाएँगे?
और क्या जनता अगले साल फिर उसी रावण के सामने खड़ी होकर वही सवाल पूछेगी?
राजनीति के इस नए प्रयोग में एक बात तो साफ है—रावण हर साल जलता है, लेकिन राजनीति में रावण का कारोबार कभी बंद नहीं होता।
अब यदि रावण दहन भी शासकीय हो गया है तो जनता को बस इतना इंतजार रहेगा कि कहीं ऐसा न हो कि पुतला सरकारी हो जाए, आग सरकारी हो जाए, मंच सरकारी हो जाए—और रावण फिर भी निजी ही रह जाए।
क्योंकि असली विजयादशमी उस दिन होगी, जब रावण का पुतला जलाने के लिए किसी सरकारी आयोजन की जरूरत नहीं पड़ेगी और समाज अपने भीतर छिपे रावण को स्वयं पहचानकर जला सकेगा।
फिलहाल तो खबर यही है कि रावण दहन भी राजनीति के अखाड़े में प्रवेश कर चुका है।
रावण शायद मुस्कुरा रहा होगा—
‘मुझे हर साल जलाते हो,
लेकिन मेरे नाम पर हर साल नई राजनीति खड़ी कर देते हो।
बताओ, असली रावण कौन है?’
रावण दहन भी अब सरकारी! कांग्रेस नेता के बयान से उठे सवाल—‘आरपांचल’ में शासकीय रावण दहन की घोषणा या सियासत का नया मंच?
