
बैम्बू पोस्ट 2 सितंबर 2026 बिलासपुर।
शहर में बारिश ने एक बार फिर अपना रौद्र रूप दिखाया, लेकिन इस बार असली खबर आसमान से नहीं, बल्कि तीसरी मंज़िल से आई। घटना इतनी गंभीर थी कि पूरे टावर में मौनभाषा का आपातकाल घोषित करना पड़ा।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पेड़ की एक टहनी पर एक चड्डी लटकी हुई थी। लगातार हो रही बारिश में वह बुरी तरह भीग रही थी और हवा के तेज थपेड़ों को लोकतांत्रिक ढंग से सहन कर रही थी। चड्डी की इस संघर्षशील स्थिति को देखकर किसी ने तुरंत तीसरी मंज़िल की ओर से फुसफुसाते हुए कहा—
“लगता है चड्डी,चड्डा साहब का है।”
इतना सुनना था कि बगल में खड़े पति देव का वैज्ञानिक धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने झल्लाकर पूछा—
“तुम्हें कैसे पता?”
इसके बाद जो हुआ, वह सामान्य घरेलू वार्तालाप नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का खगोलीय घटनाक्रम बन गया।
देखते ही देखते टावर के प्रत्येक फ्लैट की खिड़कियों, बालकनियों और पर्दों के पीछे से अनुसंधान शुरू हो गया। कोई दूरबीन ढूँढ रहा था, कोई मोबाइल का कैमरा ज़ूम कर रहा था और कुछ वरिष्ठ निवासी बिना किसी प्रमाण के निष्कर्ष निकाल चुके थे।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि किसी ने चड्डी को नीचे जाकर देखने की जहमत नहीं उठाई। आखिर इतनी ऊँचाई से अनुमान लगाना ही तो आधुनिक शहरी पत्रकारिता की पहली शर्त है।
टावर की हवा के बीच मौनभाषा में प्रश्न घूमने लगा—“किसका है?”
पुरुषों ने भी चेहरे पर गंभीरता ओढ़ ली, मानो नगर निगम ने उनसे जांच आयोग की अध्यक्षता करने का आग्रह कर दिया हो।
उधर चड्डी बारिश में भीगती रही। हवा उसे झकझोरती रही। उसे शायद इस बात की कोई खबर नहीं थी कि उसकी वजह से पूरे टावर में रिश्ते, प्रतिष्ठा और वैज्ञानिक कल्पनाएँ एक साथ हिल रही हैं।
अंततः निष्कर्ष यही निकला, चड्डी किसकी है, यह पता नहीं चला; लेकिन टावर में सबको पता चल गया कि सबको सबके बारे में कितना कुछ पता है!
