
बैम्बू पोस्ट 10 अगस्त 2026 बिलासपुर।
कहते हैं वह कुत्ते की मौत मरा।
मतलब यूँ की, कुत्ते की मौत मारना बहुत दुःखद है।
कुत्ते को कोई सम्मान हासिल नहीं होता न जीते जी न मरने के बाद। लेकिन सबके साथ ऐसा नहीं होता ;कुछ कुत्ते होते हैं जो कुत्ते होते हुए भी कुत्ते नहीं होते। वे विशिष्ट होते हैं ,माननीय होते हैं, महानुभाव होते हैं। असामान्य होते हैं।
यह प्रसंग उपस्थित हुआ है तोरवा मुक्तिधाम में एक कुत्ते के विधिवत दाह संस्कार से।
अब खबर तो यूँ है कि ,एक कुत्ता अपनी मौत मरा। मौत कुत्ते की थी लेकिन वह मरा सामान्य मौत ।मतलब जैसे आदमी आयु पूरी कर मर जाते हैं वैसे ही कुत्ता भी मर गया। कब तक जीता कोई आदमी तो है नहीं कि, जबरदस्ती काम पूरा होने के बाद, जिम्मेदारियाँ समाप्त होने के बाद भी जीने की लालसा पाले रहता है।
कुत्ते इस मामले में समझदार होते हैं।
जिम्मेदारियां खत्म काम खत्म। शरीर ने जवाब दिया, यमराज का बुलावा। आया कुत्ते ने तुरन्त यमलोक की गाड़ी पकड़ी और तत्काल यमलोक रवाना हो गया ।
यहाँ तक तो बात ठीक थी, लेकिन कुत्ते के मालिकों ने जो कुत्ते के परिजन कहे जा सकते हैं, उन्होंने उस कुत्ते की शव यात्रा निकाली, और विधिवत तोरवा मुक्तिधाम में दाह संस्कार किया।
अब यह तो कुत्ता प्रेमी परिवार या कुत्ते के परिजनों और कुत्ते के बीच का मामला है। लेकिन यहाँ बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अकारण अपनी टांग अड़ाये रहते हैं ।
बिना काज जे दाहिने बाएं….
उन्हें में से कुछ लोगों ने इस बात पर आपत्ति प्रकट कर दी कि, मनुष्य के शमशान में कुत्तों का दाह संस्कार निषेध है।
किसी समय अंग्रेजों के क्लब में लिखा रहता था-
भारतीयों का और कुत्तों का प्रवेश निषेध है
लेकिन यह कहीं नहीं मिलता कि, उन्होंने कुत्तों के दाह संस्कार का निषेध किया था, लेकिन विधि प्रकोष्ठ से जुड़े लोगों का मानना है कि, मनुष्य के शमशान घाट पर कुत्तों का अन्तिम अर्थात 16वाँ संस्कार मना है ।
अब यहीं पर पेंच लड़ जाता है- कानून कुछ और कहता है और मन कुछ और कहता है।
समान नागरिक संहिता यदि लागू होगा तो उसमें कुत्तों के दाह संस्कार के लिए क्या नियम होगा? यह भी एक सवाल है।
चिता पर लिटा कर पूरे सम्मान के साथ कुत्तों को मुखाग्नि देने वाले परिजनों का कहना है कि, यह तो
“दिल दा मामला है।”
वह कहते हैं कि, काल भैरव की सवारी के रूप में कुत्तों का सम्मान है। धर्मराज युधिष्ठिर के साथ कुत्ते का लगभग स्वर्ग तक जाना हुआ था।
कुत्ते वफादार होते हैं, कुत्ते प्रेमी होते हैं ,कुत्ते साहसी और ईमानदार होते हैं ;और अनेक मामलों में मनुष्य से बेहतर होते हैं ।
बहुत सारे लोग इस बात को भी जानते हैं कि ऐसे भी कुत्ते प्रेमी हैं जो कुत्तों को अपने साथ सुलाते हैं।
और कुत्ता उनके साथ आनंदित रहता है उन्हें संतुष्ट भी करता है।
तो कुत्ता प्रेमी समूह का कथन है कि- इन्सान को कुत्ते की तरह रखें तब एतराज होना चाहिये, लेकिन कुत्ते को इन्सान की तरह रखने पर एतराज उचित नहीं है।
कुत्तत्व को मनुष्यत्व की तरह देखने वाले लोगों का कहना है कि, इस तरह की
“””कुत्ता- घसीटी”””
ठीक नहीं है। भाई किसी को ऐतराज है तो वह मनुष्यों का दाह संस्कार कुत्तों के श्मशान घाट में कर ले ।
कुत्तों को ऐतराज नहीं होगा,
लेकिन लोग हैं कि, कुत्तों के पीछे पड़े रहते हैं।
दुनिया में इतने सारे विषय हैं- भ्रष्टाचार है, महंगाई है ,कुशासन है, अव्यवस्था है ,लेकिन लोगों तो कुत्तों के पीछे लठ्ठ लेकर फिर रहे हैं।।
भारतीय संस्कृति में तो कीट ,पतंग, चींटी, मछली को दान चुगाने, उनके साथ प्रेम से रहने की परम्परा है, फिर कुत्ते के दाह संस्कार पर लोगों को ऐतराज़ क्यों???
“”””” मेरी चलती है तो तेरी क्यों जलती है????””””
जैसा मामला है। इस कुत्ता प्रसंग को बारीकी से देख रहे कुछ टिप्पणीकारों का कथन है कि-
हमने सुना था–
“” घूरे के दिन बदलते हैं।”””
वह प्रत्यक्ष देख भी लिया।
अभी स्थिति यह है कि, बहुत सारे लोग लावारिस मर जा रहे हैं ,उनको दो गज जमीन नहीं मिल रही है ,न कफन मिल रहा है; दूसरी तरफ कुत्ते हैं जिन्हें मनुष्य से ज्यादा सम्मान मिल रहा है।
इसे कहते हैं-
“””” घोड़े को घास नसीब नहीं गधे जलेबी खा रहे हैं।”””””
बहरहाल, समय बदलता है और बदले हुए समय को मनुष्य को देखना समझना और स्वीकारना चाहिए।
शायर कहते हैं
—“””कैसे- कैसे लोग थे ऐसे- वैसे हो गये।
ऐसे- वैसे लोग थे कैसे-कैसे हो गये।””””
बहरहाल देखते हैं कि- पशुपालक- पशु प्रेमी समूह से अब कुत्ता महासंघ भी क्या इस बात की मांग करेगा कि- अब उनका भी दाह संस्कार ,तीज नहावन,(अस्थी संचय) दसगात्र अस्थि विसर्जन और तेरहवीं होनी चाहिये । और सवाल यह भी है कि जो लोग घरों में कुत्तों की तरह रह रहे हैं, वृद्ध आश्रम में, अस्पतालों में कुत्तों की तरह मर रहे हैं; उनका क्या होना चाहिये??
यह सब के लिए देखने का विषय है….
